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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 28 Oct 2024 5:33 PM |   2064 views

बीजामृत: जैविक बीज शोधन का पारंपरिक और प्रभावी उपाय

बीजामृत का उपयोग जैविक कृषि में बीज शोधन के लिए किया जाता है। यह विधि बीजों को संक्रामक रोगों से बचाने के साथ ही उनकी अंकुरण क्षमता बढ़ाने में सहायक है। बीजामृत प्राकृतिक और जैविक पदार्थों से तैयार किया जाता है, जो बीज को शक्तिशाली और रोगमुक्त बनाता है। यहाँ हम बीजामृत के महत्व, निर्माण विधि, आवश्यक सामग्री, प्रयोग विधि, और इसके उपयोग से जुड़ी सावधानियों की जानकारी देंगे।
 
बीजामृत का महत्व-
बीजामृत – बीजों को प्राकृतिक कीटाणुओं, कवकों और अन्य संक्रमणों से बचाने का एक पारंपरिक उपाय है। इसका उपयोग बीज शोधन में करने से बीजों की अंकुरण दर में सुधार होता है और पौधे अधिक स्वस्थ तथा रोग प्रतिरोधक बनते हैं। बीजामृत का मुख्य लाभ यह है कि यह पर्यावरण के अनुकूल है और मृदा की जैविक गुणवत्ता को बनाए रखता है। रासायनिक बीज शोधन की तुलना में बीजामृत अधिक सुरक्षित और प्राकृतिक तरीका है।
 
बीजामृत बनाने की आवश्यक सामग्री और मात्रा-
बीजामृत तैयार करने के लिए किसानों को कुछ विशेष जैविक सामग्रियों की आवश्यकता होती है। यह विधि सरल और सस्ती होती है, जिसे किसान आसानी से अपना सकते हैं।
 
गाय का गोबर – 5 किलो (देशी गाय का गोबर सर्वोत्तम माना जाता है)
गाय का मूत्र – 5 लीटर
चूना – 50 ग्राम
पानी – 20 लीटर
गुड़ – 250 ग्राम
बेसन – 250 ग्राम
प्लास्टिक ड्रम/सीमेंट के टैंक –  50 लीटर या ज्यादा क्षमता वाला 
 
निर्माण की प्रक्रिया-
एक बड़े बर्तन में 5 किलो गोबर और 5 लीटर मूत्र को अच्छी तरह मिलाएँ।
इस मिश्रण में 250 ग्राम गुड़ और 250 ग्राम बेसन डालकर मिश्रण को मिलाएँ। इस घोल में 50 ग्राम चूना और 20 लीटर पानी डालें। सभी सामग्री को अच्छी तरह मिलाकर एक अच्छा घोल तैयार करें।
इस घोल को 12-24 घंटे तक ढककर रखें ताकि यह किण्वित हो सके और इसमें लाभदायक सूक्ष्मजीव अच्छी बढ़त कर लें। इस अवधि के बाद, बीजामृत बीज शोधन के लिए तैयार है।
 
बीजामृत की प्रयोग विधि-
बीज शोधन के लिए बीजामृत का प्रयोग इस प्रकार किया जाता है:-
 
बुवाई से पहले बीजों को बीजामृत के घोल में 30 मिनट तक भिगोएँ। 30 मिनट बाद, बीजों को बाहर निकालकर छायादार स्थान पर हल्का सूखा लें। सूखने के बाद, बीजों को खेत में बोया जा सकता है।
 
बीजामृत प्रयोग से जुड़ी सावधानियाँ-
1. साफ-सफाई का ध्यान रखें: बीजामृत बनाते समय साफ बर्तन और ताजे गोबर-मूत्र का ही उपयोग करें। इससे मिश्रण में कोई बाहरी संक्रमण नहीं होगा।
2. सही स्थान पर रखें: मिश्रण को धूप से बचाकर छायादार स्थान पर रखें।
3. जल्द उपयोग करें: बीजामृत को तैयार होने के तुरंत बाद अगले 1-2 दिन में ही उपयोग करें। अधिक समय तक रखे जाने पर इसकी प्रभावशीलता घट सकती है।
4. बीज को अधिक समय न भिगोएँ: बीजों को अधिक समय तक बीजामृत में भिगोकर न रखें, अन्यथा उनके अंकुरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
5. बीजामृत को किसी धातु के बर्तन /ड्रम या किसी धातु के डंडे के सम्पर्क में. नही आने देना चाहिये। सीमेंट, प्लास्टिक के टैंक में ही बनायें और किसी लकड़ी /बांस से ही घोल को चलाने के लिये प्रयोग करें.
6. बीजामृत को बनाने के बाद कभी भी ढक्कन कस कर न बन्द करें, हवा का प्रवाह होने दें।
 
विशेष टिप्पणी –
बीजामृत जैविक कृषि में एक महत्वपूर्ण साधन है, जो बीजों को स्वस्थ, शक्तिशाली, और रोगमुक्त बनाता है। इसका उपयोग सरल, सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल है। बीजामृत का नियमित उपयोग न केवल बीजों की गुणवत्ता में सुधार करता है, बल्कि फसल की वृद्धि और उत्पादन क्षमता को भी बढ़ाता है। जैविक कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए बीजामृत एक उत्कृष्ट विकल्प है, जो किसानों को सुरक्षित, टिकाऊ और लाभकारी फसल उत्पादन की ओर अग्रसर करता है।
 
डॉ. शुभम कुमार कुलश्रेष्ठ विभागाध्यक्ष -उद्यान विभाग ,केन्द्र समन्वयक – कृषि शोध संस्थान, कृषि संकाय ,रविंन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, रायसेन, मध्य प्रदेश
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