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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 2 Jan 2021 6:01 PM |   1940 views

हूँ

 

मुझे अच्छी लगती है तुम्हारी “हूं
एक “हूं” में समाई है आश्वस्ति
भासमान तुम्हारी उपस्थिति की
तुम्हारी स्वीकारोक्ति की
 
और छंट जाते हैं काले बादल
नि:शंक  निर्बाध हो 
सहज चल पड़ता है जीवन
 
पर “हूं” का बदला तेवर
खींच देता है लगाम
थम जाते हैं जीवन रथ के पहिए
 जम जाते हैं चलते पांव
 
बोल रहे शब्द सिहर जाते हैं
पल में बदल जाता माहौल
कि बन रही गुंजाइश अपने आप को देखने की
एक चेतावनी सुधरने की
कि दिशाच्युत हो रहा जीवन
भटक रहा व्यतिक्रम से
 
माना विराट है तुम्हारी हुंकार
 
तुम्हारी एक “हूं” में समा जाता है
संपूर्ण भूत भविष्य वर्तमान
जीवन की संपूर्ण यात्रा
 
पर क्या सदैव तुम रहे इतने मुखर
कितने ही दफ़े जब दरकार रही तुम्हारी उपस्थिति की
नियति के पर लगा करती रही वह धूंध का सफर
और डगमगाता रहा विश्वास
उहापोह में रहा जीवन
प्रश्नचिन्ह लगाता है
 
“क्यूं नही यह अन्यायी के हृदय में व्यापता है
कि कांप जाये उसका मन
आक्रांत हो वह कर्मफल से
न निर्भीक हो
कि नष्ट हो पाप
सर्वोपरि पूण्य हो !
 
 आराधना, बलिया 
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