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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 23 Oct 3:42 PM |   496 views

विषाक्त खेती छोड़ शुरू करे जीरो बजट की प्राकृतिक खेतीःप्रो. रवि प्रकाश

बलिया -आचार्य  नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौधौगिक विश्व विद्यालय कुमारगंज अयोध्या  द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र सोहाँव बलिया  के तत्वधान मे  कोरोना  के नियमों का पालन करते हुए  सब्जियों की प्राकृतिक खेती पर दो दिवसीय  प्रशिक्षण का आयोजन  कृषि प्रसार कार्यकर्ताओं हेतु 21-22अक्टूबर  तक किया गया। 
 
केन्द्र के अध्यक्ष प्रो. रवि प्रकाश मौर्य ने  बताया कि  सब्जियों में रसायनिक उर्बरकों और कीटनाशकों का अधिक प्रयोग मनुष्य के लिए घातक साबित हो सकता है। इसी के चलते  सब्जी की खेती में बदलाव लाकर जीरो बजट प्राकृतिक खेती की पहल की जा रही  है।देश में करीब 50 लाख किसानों ने प्राकृतिक खेती को अपनाना प्रारंभ किया है।
 
जीवामृत देशी गाय के गोबर, गौमूत्र को मिलाकर बनाया जाता है। देशी गाय के एक ग्राम गोबर में 3 करोड़ वैक्टीरिया होते हैं। जब इस गोबर और गोमूत्र में गुड़ मिला दिया जाए तो वैक्टीरिया लगातार बढ़ते चले जाते हैं। इसमें बेसन मिलाया जाता है, जो वैक्टीरिया का भोजन है। इसमें गौमूत्र, गोबर, गुड़,बेसन एवं बरगद के पेड़ की नीचे की एक मुटठी मिटटी डाल दी जाती है।फिर इसे दो से चार मिनट तक लकड़ी के सहारे चलाया जाता है ताकि यह सब आपस में एक साथ मिल जाए। यह क्रिया चार दिन की जाती है ।एक एकड़ में लगी फसल पर 200 लीटर जीवामृत लगता है, और इसे एक माह में एक ही बार प्रयोग किया जाता है। जिससे पौधों की बाढ़ जबर्दस्त होती है। इसी के घोल को पानी में मिलाकर स्प्रे कर दिया जाए तो कीट नहीं पनपते। जिससे उत्पादन भरपूर मिलता है। इससे खेत में फसल बेहतर गुणवत्ता के साथ ही जैविक खेती और केमिकल खाद से खेती को काफी पीछे छोड़ देती है।
 
ई.एम.पी.सिंह सह प्राध्यापक (कृषि अभियंत्रण) ने बताया कि फसलों की बुआई मेड़ एवं नाली पध्दति से किये जाने पर अच्छे परिणाम मिलते है।
 
प्रशिक्षण समन्वयक  राजीव कुमार सिंह उधान वैज्ञानिक ने कहा कि  क्षेत्र विशेष मे विकसित हुए बीज  उस क्षेत्र की जलवायु, भूमि, जल,तापक्रम में स्थापित होकर भरपूर  उत्पादन करते है। प्राकृतिक खेती के लिये  स्थानीय तौर पर  आज भी लौकी,नेनुआ, तरोई, सतपुतिया, कद्दू,  अदरक ,हल्दी, सूरन आदि के बीज उपलब्ध है।
 
डा.प्रेम लता श्रीवास्तव सह प्राध्यापक (गृह विज्ञान)  ने  बताया कि प्राकृतिक खेती के उत्पाद बहुत दिनों तक  संरक्षित रहते है। 
 
बेद प्रकाश सिंह प्रक्षेत्र प्रवंधक ने बीजों की प्रजाति सिंचाई पध्दतियों पर
प्रकाश डाला।  जनपद के बिकास खण्ड सोहाँव के 20  कृषि प्रसार कार्यकर्ताओं  ने भाग लिया।
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