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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 29 Feb 2020 2:27 PM |   3005 views

दोस्त-ए-अमरीका

गुणवत्ता का प्रतीक जापान आज जिस ऊंचाईपर पहुंचा है उसमें अमेरिका का महती योगदान रहा है। अमेरिका के समक्ष जापान ने1945   में आत्मसमर्पण किया अवश्य, पर अमेरिका जापान की क्षमताओं से खूब परिचित था। मैकार्थर कार्यक्रम के तहत  अमेरिका के सहयोग से1949  से जापान में जो क्वालिटी आन्दोलन शुरू हुआ वह आगे चलकर विश्वव्यापी आन्दोलन बना।  इससे पहले अमेरिका ने 1862 से 1869  के Meiji Restoration दौरान भी जापान में काफी बदलाव कराये थे। भारत की भांति जापान में भी पहले चतुर्जातीय व्यस्था थी, गुलामी व अछूत (outcastes) प्रथाएं थीं; Daimo तथा Samurai जातियों का सामंती प्रभुत्व था। एड्मिरल पेरी के नेतृत्व में अमेरिका ने जापानी सम्राट को अधिकार वापस दिलवाए, आधुनिक सेना का गठन करवाया। इसी सेना के द्वारा Daimo तथा Samurai जैसे जातिवादी सामंतों का ऐसा दमन करवाया कि जापान से जातीय व सामंती वर्चस्व हमेशा के लिए समाप्त हो गया। जापान की यह आधुनिक सेना इतनी ताकतवर हो गयी कि इसने 1894 में जापान से पच्चीस गुने बड़े चीन को धूलचटा दिया और 1905 में रूस को बुरी तरह हराया जो जापान से लगभग चालीस गुना बड़े आकार का है।  परन्तु इसी जापानी सेना ने उग्र राष्ट्रवादी जोश में अमेरिका के ही पर्ल हार्बर पर हमले का ग़लत कदम उठाया। बदले में अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिराए, निरंकुश सेना को प्रतिबंधित कराया और १९४७ में नया संविधान बनवाया जिसके तहत जापान में वैज्ञानिक सम्राट हिरोहितो के नेतृत्व तथा डेमिंग के निर्देशन में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आदृत प्रगति का नया अध्याय १९४९ से आरम्भ हुआ।

  • अमेरिका के पास वह ताकत है कि वह चाहे तो अपने सहयोगियों के साथ भारत समेत पूरी दुनिया को मजहबी, जातीय व नस्ली पूर्वाग्रहों को छोड़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के अनुसरण को बाध्य कर सकता है।
  • भारत के असली शत्रु पाकिस्तान या चीन नहीं है, असली शत्रु तो यहां के राजनेता हैं, जो आजादी के पहले से लेकर आज तक देश को संकीर्णताओं में जकड़ कर खोखला करते रहे हैं, वोट की राजनीति के चलते। पाकिस्तान भी तो इन्हीं चालाक राजनेताओं की देन है। अब देखना यह है कि अपने‌ राष्ट्र को जातीय, मजहबी, दकियानूसी व उग्र राष्ट्वादी संकीर्णताओं से निकाल कर पुनर्निर्माण में हम अपने काबिल दोस्त का कितना सहयोग ले पाते हैं।
  • यहां यह स्पष्ट कर दें कि उग्र राष्ट्रवाद और रचनात्मक राष्ट्रीयता में बहुत अन्तर है। उग्र राष्ट्रवाद भावनात्मक उन्माद लाने राजनीतिक हथियार है जबकि  रचनात्मक राष्ट्रीयता सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक समृद्धि और उन्नति से सम्बद्ध है। अतः यह अपेक्षाकृत ठोस अवधारणा है। उदाहरणार्थ हिटलर,मुसोलिनी, तोजो (द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान दौरान जापान का कमांडर वह प्रधानमंत्री) आदि का राष्ट्रवाद। १९४५ में आत्मसमर्पण के बाद जापान ने अपने आक्रामक जापानी राष्ट्रवाद को राष्ट्रीय जीवन की रचनात्मक अवधारणा में बदल दिया। जर्मनी व इटली ने भी कुछ ऐसा ही किया।  राष्ट्रीय जीवन की इस अवधारणा ने एक युद्धनष्ट देश को बहुत ही कम अवधि में सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता और समृद्धि के प्रतीक में बदल दिया ।
  • इसी रास्ते को शुरू में उत्तर कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और हॉन्गकॉन्ग द्वारा अपनाया किया गया; और बाद में इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया, आदि द्वारा।  चीन ने तकनीकी क्रांति के साथ साम्यवादी रूढ़िवाद को मिलाया है जिससे तेजी से उन्नति हुई है मुख्यत: भौतिक दायरे में सीमित। यहां तक कि अमेरिका व यूरोप ने भी इस अनुभव से बहुत कुछ सीखा। पर हम तो स्वघोषित जगतगुरु हैं आज से नहीं हजारों साल से। हमारा काम दुनिया को सिखाना है सीखना नहीं।

    (प्रोफेसर आर पी सिंह, दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय)

     
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