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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 7 Sep 2026 7:09 PM |   6 views

जब कोई परिवार अपने बेटे या बेटी को कृषि विश्वविद्यालय में प्रवेश दिलाता है, तो वह केवल चार वर्ष की पढ़ाई के लिए फीस नहीं देता। वह अपने बच्चे का भविष्य विश्वविद्यालय के भरोसे छोड़ता है।
 
  •  किसान परिवार सोचता है कि उसका बच्चा खेती को नए स्तर तक ले जाएगा।
  •  मध्यमवर्गीय परिवार सोचता है कि बच्चे को सम्मानजनक रोजगार मिलेगा।
  • कुछ माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा वैज्ञानिक बने।
  • कुछ चाहते हैं कि वह अपना व्यवसाय स्थापित करे।
  • और कुछ की सबसे बड़ी इच्छा केवल इतनी होती है कि उनका बच्चा जीवन में अपने पैरों पर खड़ा हो जाए।
इसलिए कृषि विश्वविद्यालयों को सबसे पहले एक कठिन लेकिन आवश्यक प्रश्न स्वयं से पूछना चाहिए:
 
  • चार वर्ष बाद हम इस विद्यार्थी को वास्तव में क्या बनाकर भेज रहे हैं?* केवल एक Graduate? या एक ऐसा व्यक्ति जो अपने परिवार, समाज और स्वयं के जीवन को बेहतर बनाने की क्षमता रखता हो? यहीं से कृषि शिक्षा की वास्तविक चर्चा शुरू होती है।
 
विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने की जगह नहीं है-
कृषि शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्यार्थी को यह बताना नहीं होना चाहिए कि किसी फसल में कितनी खाद दी जाती है या किसी रोग का वैज्ञानिक नाम क्या है।यह ज्ञान आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं है।
 
एक कृषि स्नातक को यह भी सीखना चाहिए:-
  • समस्या को कैसे पहचाना जाए?
  •  सही प्रश्न कैसे पूछे जाएं?
  • किसान की परिस्थिति को कैसे समझा जाए?
  •  एक समाधान को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कैसे बदला जाए?
  • डेटा कैसे लिया जाए?
  • उसका विश्लेषण कैसे किया जाए?
  •  नई तकनीक को कैसे आजमाया जाए?
  • यदि कोई विचार सफल हो, तो उसे समाज और बाजार तक कैसे पहुंचाया जाए।
  • कृषि की पढ़ाई का अंतिम उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है।
अभिभावक को विश्वविद्यालय से क्या अपेक्षा रखनी चाहिए?-
आज अधिकांश अभिभावक पूछते हैं: “यह विश्वविद्यालय कैसा है?” लेकिन शायद इससे पहले कुछ और प्रश्न पूछने चाहिए।
* क्या मेरा बच्चा यहां केवल कक्षाओं में बैठेगा या वास्तविक जीवन से जुड़ेगा?
* क्या वह खेत में काम करेगा?
* क्या वह किसानों के बीच जाएगा?
* क्या वह उद्योग को समझेगा?
* क्या उसे अपना कोई प्रयोग करने का अवसर मिलेगा?
* क्या वह शोध करना सीखेगा?
* क्या वह अपनी बात लिख और प्रस्तुत कर सकेगा?
* क्या वह अपनी असफलता से सीखना सीखेगा?
* क्या चार वर्ष बाद उसके पास केवल Degree और Marks होंगे?
या फिर उसके पास Skills, Experience, Confidence और कुछ ऐसा काम होगा जिसे वह दुनिया को दिखा सके?
 
*विद्यार्थी को यह समझना होगा कि वह यहां क्यों आया है*
कृषि विश्वविद्यालय में आने वाला हर विद्यार्थी स्वयं से एक प्रश्न पूछे: *“मैं चार वर्ष बाद कैसा व्यक्ति बनना चाहता हूं?”*
यदि उसका लक्ष्य केवल परीक्षा पास करना है, तो वह शायद डिग्री प्राप्त कर लेगा, लेकिन यदि उसका लक्ष्य Excellence है, तो उसे डिग्री से आगे जाना होगा। उसे खेत में जाना होगा, किसान से बात करनी होगी, उसे किताब से बाहर पढ़ना होगा, उसे प्रश्न पूछने होंगे, उसे नई चीजें आजमानी होंगी, उसे अपनी रुचि खोजनी होगी।
कृषि के भीतर कोई विद्यार्थी:
* Scientist बन सकता है।
* Entrepreneur बन सकता है।
* Farm Manager बन सकता है।
* Agricultural Officer बन सकता है।
* Seed या Nursery Business शुरू कर सकता है।
* Food Processing कर सकता है।
* Agri-Tech क्षेत्र में जा सकता है।
* Government Service में जा सकता है।
लेकिन यह रास्ता अंतिम वर्ष में अचानक नहीं मिलता। इसकी तैयारी पहले दिन से शुरू होती है।
 
*RAWE और ELP केवल अंतिम वर्ष का कार्यक्रम नहीं हैं*
भारतीय कृषि शिक्षा में *RAWE अर्थात Rural Agricultural Work Experience* और *ELP अर्थात Experiential Learning Programme* जैसी व्यवस्थाएं अत्यंत महत्वपूर्ण सोच पर आधारित हैं। इनका मूल उद्देश्य विद्यार्थी को वास्तविक कृषि जीवन से जोड़ना है। जब विद्यार्थी गांव में जाता है, पंचायत स्तर पर काम करता है, किसानों के बीच रहता है और वास्तविक समस्याओं को समझता है, तब उसे पता चलता है कि किताब में लिखा समाधान हर परिस्थिति में एक जैसा काम नहीं करता। वह समझता है कि किसान का निर्णय केवल विज्ञान से नहीं बनता।
उसमें:
* आर्थिक स्थिति होती है।
* मजदूर की उपलब्धता होती है।
* पानी की स्थिति होती है।
* बाजार होता है।
* मौसम होता है।
* जोखिम होता है।
* परिवार की जरूरतें भी होती हैं।
इसी प्रकार ELP विद्यार्थी को केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि *करते हुए सीखने* का अवसर देता है।
* वह किसी परियोजना या गतिविधि को चुनता है।
* उस पर काम करता है।
* परिणाम देखता है।
* समस्याओं का सामना करता है।
* आंकड़े जुटाता है।
* अंत में अपनी रिपोर्ट तैयार करता है।
यह कृषि शिक्षा का अत्यंत शक्तिशाली हिस्सा है। लेकिन प्रश्न यह है: *क्या इतनी महत्वपूर्ण शिक्षा केवल अंतिम वर्ष या सीमित अवधि तक ही रहनी चाहिए?*
 
*पहले वर्ष से ही ‘Experience Based Learning’ शुरू हो*
* पहले वर्ष का विद्यार्थी अभी कृषि को समझना शुरू कर रहा होता है। उसे केवल किताबों और परिभाषाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे गांव दिखाइए। किसान से मिलाइए। विश्वविद्यालय के प्रयोगों को दिखाइए।
उसे एक प्रश्न दीजिए: *“अपने क्षेत्र की कृषि की सबसे बड़ी समस्या खोजिए।”*
* दूसरे वर्ष तक वह अलग-अलग कृषि प्रणालियों को समझे, वह किसी किसान के खेत का अध्ययन करे। किसी एक फसल की पूरी कहानी समझे।बीज से बाजार तक।
* तीसरे वर्ष में उसे एक वास्तविक समस्या पर काम करने का अवसर मिले। वह छोटा शोध करे,डेटा जुटाए, तुलना करे और निष्कर्ष निकाले।
* चौथे वर्ष में RAWE और ELP उसके लिए अचानक शुरू होने वाला कार्यक्रम न हों। बल्कि पिछले तीन वर्षों में विकसित अनुभव का उच्च स्तर हों। तब वह गांव में जाकर केवल उपस्थिति नहीं लगाएगा। 
*वह एक प्रशिक्षित समस्या समाधानकर्ता के रूप में जाएगा।*
 
*गांव को केवल भ्रमण स्थल मत बनाइए*
कृषि शिक्षा में गांव केवल एक Study Tour का स्थान नहीं होना चाहिए। एक उत्कृष्ट कृषि विश्वविद्यालय कुछ गांवों को लगातार सीखने और काम करने के मॉडल के रूप में अपना सकता है। विद्यार्थी वहां बार-बार जाएं।
* पहले वर्ष में देखें।
* दूसरे वर्ष में समझें।
* तीसरे वर्ष में समस्या पर काम करें।
* अंतिम वर्ष में समाधान और परिणाम का मूल्यांकन करें।
इससे विद्यार्थी को एक ही गांव और परिवारों की कृषि यात्रा देखने का अवसर मिलेगा। वह समझ सकेगा कि कृषि में बदलाव एक दिन में नहीं आता। विश्वविद्यालय और गांव के बीच ऐसा संबंध बने कि किसान भी कह सके:
*“यह विश्वविद्यालय केवल कार्यक्रम करने नहीं आता, हमारे साथ लगातार काम करता है।”*
 
Summer और Winter को खाली समय नहीं, अवसर बनाइए-
भारत में कृषि शिक्षा का एक बड़ा अवसर Semester के बीच मिलने वाला समय है।
* Summer Training
* Winter School
* Short-Term Skill Camp
* Industry Attachment
* Farm Attachment
* Research Internship
ये केवल प्रमाणपत्र लेने की गतिविधियां नहीं होनी चाहिए। हर विद्यार्थी को अपनी रुचि के अनुसार अवसर चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
* जिसे Protected Cultivation पसंद है, वह किसी उत्कृष्ट फार्म पर जाए।
* जिसे अनुसंधान पसंद है, वह Research Laboratory से जुड़े।
* जिसे व्यवसाय में रुचि है, वह Agri-Business या Startup के साथ काम करे।
* जिसे ग्रामीण विकास पसंद है, वह पंचायत या Farmer Producer Organisation के साथ जुड़े।
* जिसे Food Processing पसंद है, वह Processing Unit में काम करे।
*छुट्टियों के बाद विद्यार्थी केवल घर से वापस न आए।* वह एक नया अनुभव लेकर वापस आए।
और उस अनुभव को Report, Presentation, Discussion और Portfolio का हिस्सा बनाए।
 
*हर विद्यार्थी के पास चार वर्ष की अपनी ‘Learning Journey’ हो*
विद्यार्थी की पहचान केवल Semester Marks से नहीं होनी चाहिए। विश्वविद्यालय में प्रवेश के पहले दिन से उसकी एक *Learning and Excellence Portfolio* शुरू हो सकती है। इसमें दर्ज हो:
* उसने किन किसानों से बातचीत की?
* कौन-से गांवों में काम किया?
* कौन-सी समस्या पहचानी?
* कौन-सा प्रयोग किया?
* किस Summer या Winter Training में भाग लिया?
* कौन-सी Internship की?
* कौन-सा Research Project किया?
* कौन-सा Innovation विकसित किया?
* कौन-सी रिपोर्ट या लेख लिखा?
* कौन-सा Model बनाया?
* उसकी क्या सफलता रही?
* और उसने असफलता से क्या सीखा?
चार वर्ष बाद विद्यार्थी के पास केवल Degree नहीं होगी। उसके पास अपने काम का प्रमाण होगा। वह कह सकेगा कि *“मैंने केवल पढ़ाई नहीं की है, मैंने यह सब किया है।”* हो सकता है उसका शोध बहुत बड़ा न हो। लेकिन वह Research Mindset विकसित करेगा और यही भविष्य के वैज्ञानिक, Innovator और Problem Solver तैयार करेगा।
 
Teacher का काम केवल पढ़ाना नहीं, विद्यार्थी को पहचानना भी है-
एक अच्छा शिक्षक केवल विषय विशेषज्ञ नहीं होता। वह विद्यार्थी में छिपी क्षमता को पहचानता है। हर विद्यार्थी एक जैसा नहीं होता और हर विद्यार्थी को एक ही रास्ते पर चलाने की कोशिश भी उचित नहीं है। इसलिए शिक्षक की भूमिका केवल Lecture देना नहीं होनी चाहिए। *उसे Mentor बनना होगा।* ऐसा Mentor जो विद्यार्थी को यह समझने में सहायता करे कि: “तुम किस काम में वास्तव में अच्छे हो सकते हो?”
कृषि शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। 
* किसी विद्यार्थी को Research की दिशा देता है।
* किसी को Entrepreneurship की।
* किसी को Competitive Examination की तैयारी में प्रेरित करता है।
* किसी को Field Work में मजबूत बनाता है।
* किसी को Writing और Communication में बेहतर करता है।
 
Innovation को प्रयोगशाला से बाहर निकलना होगा-
विश्वविद्यालय में अनेक अच्छे विचार पैदा होते हैं, लेकिन बहुत से विचार Report बनकर समाप्त हो जाते हैं। कृषि शिक्षा को विद्यार्थी को यह सिखाना चाहिए कि:
  •  एक विचार Technology कैसे बनता है?
  •  एक Technology Product कैसे बनती है?
  • एक नया समाधान Patent के योग्य कब होता है?
  •  किसी Innovation को किसान या बाजार तक कैसे पहुंचाया जा सकता है?
यदि विद्यार्थी के मन में यह सोच विकसित हो जाए कि:“मेरी पढ़ाई से कुछ नया बन सकता है,”तो विश्वविद्यालय केवल Graduates नहीं, Creators तैयार करेगा।
 
परीक्षा भी बेहतर को मापे-
हम विद्यार्थियों से Excellence की अपेक्षा करते हैं, लेकिन परीक्षा में कई बार केवल याद रखने की क्षमता मापते हैं। यह अंतर बदलना होगा। परीक्षा में विद्यार्थी के सामने वास्तविक समस्या रखी जाए।
  •  उसे किसान की परिस्थिति दी जाए।
  •  उसे आंकड़े दिए जाएं।
  • उसे Field Situation दिखाई जाए।
और पूछा जाए: “आप क्या करेंगे और क्यों करेंगे?
  • Case Studies
  • Problem Solving
  • Field Diagnosis
  • Project Work
  • Presentation
  •  Practical Decision Making
को परीक्षा का अधिक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा। कृषि में सही उत्तर हमेशा किताब की एक पंक्ति नहीं होता। कई बार सही उत्तर परिस्थितियों को समझकर लिया गया निर्णय होता है।
 
Management की सबसे बड़ी भूमिका: अवसरों का वातावरण बनाना-
किसी विश्वविद्यालय की सफलता केवल उसके नियमों से तय नहीं होती। उसकी सफलता इस बात से भी तय होती है कि वहां अच्छे विचार कितनी जल्दी अवसर बन पाते हैं। प्रबंधन का काम हर गतिविधि स्वयं करना नहीं है। प्रबंधन का सबसे महत्वपूर्ण काम *ऐसा वातावरण बनाना है जिसमें*:
  • अध्यापकनया काम करने के लिए प्रेरित हो।
  •  विद्यार्थी  प्रयोग करने के लिए उत्साहित हो।
  • किसान विश्वविद्यालय से जुड़ सके।
  • Industry सहयोग करना चाहे।
  • अच्छा विचार अनावश्यक देरी में समाप्त न हो।
 
नियम आवश्यक हैं, जवाबदेही आवश्यक है, वित्तीय अनुशासन आवश्यक है, लेकिन अकादमिक जीवन में ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए जहां छोटे लेकिन उपयोगी विचारों को तेजी से अवसर मिल सके।
  •  एक नया Student Project
  • एक Farmer Learning Programme
  • एक Summer Skill Camp
  •  एक Research Internship
  • एक Innovation Model
  • एक Industry Attachment।
 
ऐसे कार्यों के लिए विश्वविद्यालय की व्यवस्था सहयोगी और समयबद्ध होनी चाहिए। एक अच्छा विश्वविद्यालय वह नहीं है जो केवल अपने परिसर की सुंदरता दिखाए, बिल्डिंग ख़डी करे और प्रचार माध्यमों से एडमिशन लेता भीड़ बढ़ाता जाये। एक अच्छा विश्वविद्यालय वह है जो चार वर्ष बाद विद्यार्थी के व्यक्तित्व में बदलाव दिखा सके। जहाँ बच्चे और उनकी success story जो असल मे टिकाऊ रही हों उन्हें स्वमेव mouth publicity मिले। 
 
अच्छे विचारों को केवल अनुमति नहीं, अवसर चाहिए।
 
कृषि विश्वविद्यालय का लक्ष्य क्या होना चाहिए?
चार वर्ष बाद एक विद्यार्थी विश्वविद्यालय से बाहर निकले और उसके माता-पिता महसूस करें कि उनका बच्चा बदला है…वह केवल अधिक पढ़ा-लिखा नहीं हुआ।
  • वह अधिक जिम्मेदार हुआ।
  • अधिक आत्मविश्वासी हुआ।
  • समस्या को समझना सीखा।
  •  काम करना सीखा।
  • लोगों से संवाद करना सीखा।
  • असफलता से सीखना सीखा।
  • अपने लिए और दूसरों के लिए अवसर बनाना सीखा। यही वास्तविक शिक्षा है।
 
कृषि की पढ़ाई केवल नौकरी पाने के लिए नहीं होनी चाहिए।यह विद्यार्थी को अपने परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति बेहतर बनाने की क्षमता दे। उसे समाज की समस्याओं को हल करने की क्षमता दे। उसे किसानों के साथ सम्मानपूर्वक काम करना सिखाए और उसे यह आत्मविश्वास दे कि “मैं जहां भी जाऊंगा, कुछ बेहतर कर सकता हूं।”
 
मान्यता आवश्यक है, पाठ्यक्रम आवश्यक है, परीक्षा आवश्यक है, लेकिन इन सबका अंतिम उद्देश्य केवल  डिग्री देना नहीं है। अंतिम उद्देश्य है एक सक्षम, जिम्मेदार और उत्कृष्ट व्यक्ति तैयार करना और शायद यही किसी भी विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
ऐसा विद्यार्थी, जिस पर:-
  • उसके माता-पिता गर्व करें।
  • जिस पर शिक्षक विश्वास करें।
  •  जिसकी जरूरत किसान महसूस करे।
  • जिसे उद्योग अवसर दे।
  • जो स्वयं अपने जीवन और समाज में बदलाव लाने की क्षमता रखता हो।
  • क्योंकि उत्कृष्ट विश्वविद्यालय की पहचान उन लोगों से होती है जिन्हें वह बनाकर समाज में भेजता है।
 
डॉ. शुभम कुमार कुलश्रेष्ठ ,विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापक, उद्यान विभाग (कृषि संकाय)
रविन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय ,रायसेन, मध्य प्रदेश (भारत)
 
 
 
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