Monday 31st of August 2026 10:02:39 PM

Breaking News
  •  भारत हर मुश्किल वक़्त में नेपाल के साथ -राजनाथसिंह|
  • कुशीनगर में नारायणी से अब तक 13 शव बरामद |
  • बहराइच को मुख्यमंत्री योगी का तोहफा -चार नई ट्रेन सेवाओं का किया शुभारम्भ|
Facebook Comments
By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 31 Aug 2026 6:57 PM |   39 views

भोजपुरी फ़िल्मों के सर्वोत्तम गीतकार शैलेन्द्र

भोजपुरी की पहली महान फ़िल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबों’ (1962 में विश्वनाथ प्रसादशाहाबादी द्वारा निर्मित)के अविस्मरणीय गीतकार शैलेन्द्र का आज जन्मदिन है| शैलेन्द्र मूलतः बिहार में आरा (अख़्तियारपुर बड़का गांव) के रहनेवाले थे,उनकी रगों में मातृ भाषा भोजपुरी की गंगा बह रही थी जिसकी मिठास उनके गीतों में सुनाई पड़ती है. ‘तीसरी क़सम’ में वह यादगार बन गई है| शैलेन्द्र(मूलनाम- शंकरदास केसरीलाल) 30 अगस्त 1923 को ब्रिटिश भारत के रावलपिंडी में जन्में जहां उनके दलित पिता फ़ौजी अस्पताल में नौकर थे| बचपन में ही मां और बहन चल बसीं, रिटायरमेंट के बाद पिता शैलेन्द्र के साथ मथुरा आ गये थे |जहां किशोरी रमन इंटर कॉलेज से शैलेन्द्र की काव्य यात्रा शुरू हुई| मथुरा में सोलह साल बाद उन्हें रेलवे की नौकरी मिली फिर तबादले पर बंबई माटुंगा रेलवे वर्कशाप 1947 में गये जहां राजकपूर से मुलाक़ात हुई |
 
और गीत लेखन का शानदार दौर शुरू हुआ| राज कपूर , शंकर- जय किशन, मुकेश और शैलेन्द्र की मंडली बहुत मशहूर थी| 1948 में झांसी रेलवे-स्टेशन मास्टर की बेटी शकुन्तला से प्रेम विवाह किया जिससे शैली,मनोज, अमला,गोपा और दिनेश तीन बेटे व दो बेटियां पैदा हुईं| वे इपटा के सदस्य भी थे.1948 में ‘आग’ 1949 में ‘बरसात’ 1951 में ‘आवारा’ और 1955में ‘श्री 420’ ने उन्हें फ़िल्म जगत के। स्वर्ण युग का बक़ौल गुलज़ार सर्वोत्तम गीतकार बना दिया|
 
अविजीत घोष ने ‘सिनेमा भोजपुरी'(पेंगुइन,यू के,ISBN:978-81-8475-256-4; पृष्ठ 184) में लिखा है कि अप्रैल 1965 में कलकत्ता में उन्हें बेस्ट लिरीसिस्ट के ख़िताब से नवाज़ा गया| 1966 में शैलेन्द्र ने फणीश्वर नाथ रेणु के आधार पर ‘ तीसरी क़सम ‘ बनाई जिसे नेशनल फ़िल्म एवार्ड मिला| उन्हें तीन बार 1958,1959 और 1968 में फ़िल्म फ़ेयर का बेस्ट लीरिसीस्ट एवार्ड भी मिला. उनकी पुस्तक है ‘अंदर की आग’. अंतिम समय में वह दोस्तों की बेवफ़ाई और आर्थिक तंगी से टूट गये थे| 4 दिसंबर 1966 को 43 वर्ष की उम्र में शैलेन्द्र ने दुनिया को अलविदा कह दिया था|
 
उनके सैकड़ों गीतों का मैने गहराई से शोधपरक विश्लेषण किया तो चकित रह गया कि शायद ही कोई गीत हो जिसमें भोजपुरी के शब्द न आए हों| मेरी मान्यता है कि उनके भीतर असल में एक भोजपुरिया हर क्षण उछाल मार रहा था| वे सोलह साल ब्रज क्षेत्र में रहे, ब्रजभूमि में पढ़े लिखे, लेकिन सतरह साल के फ़िल्मी जीवन में भोजपुरी माटी के बीज ने अपनी अमर उर्वरता को पुष्पित और सुगंधित किया|
 
मैं भी विगत चालीस सालों से ब्रजभूमि पर ही हूं परन्तु मातृभाषा भोजपुरी की अमिट धरोहर से स्वयं को समृद्ध पाता हूं| शैलेन्द्र के अमर भोजपुरी गीतों में सर्वश्रेष्ठ मुझे लगता है: ” सोनवा के पींजरा मे बंद भईल हाय राम, चीरई कऽ जीयरा उदास” जिसे गाने में मोहम्मद रफ़ी भी सिसक पड़े थे , फिर ‘बंदिनी’ का वह गीत “अब की बरस भेज भईया को बाबुल ” आज भी रुला देता है|
 
“हे गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो, सईयां से करि दे मिलनवा हो राम”, “लागी नाहीं छूटे रामा चाहे जिया जाये”, “चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे पिंजरे वाली मुनिया”, “अब तऽ लागल मोरा सोरहवां साल, लोगवा नजर लगावेला ” जैसे अविस्मरणीय नित नवीन सदा जीवंत गीतों के अलावा भोजपुरी के उनके सारे गीतों ने अपार लोकप्रियता पायी है. लगभग उनके हर गीत में भोजपुरी का कोई न कोई शब्द ज़रूर आया है|भोजपुरी को शैलेन्द्र पर सदैव गर्व रहेगा| आजके फूहड़ भोजपुरी फ़िल्म गीतकारों को शैलेन्द्र से सीख लेनी चाहिए|
 
 – डॉ. लारी आज़ाद, अलीगढ़
Facebook Comments