राखी
ना राखी का मोल लगाना,
‘राखी’ जन्मों के रिश्ते हैं
इन्हें प्रेम से सदा निभाना ।
राखी केवल धागा नहीं
यह भावों का अभिनंदन है,
प्रेम,समर्पण,त्याग भरोसा
इन सबसे पावन बंधन है।
राखी आती है तो लगता
बचपन लौट के आया है,
सूना-सूना मन भी फिर से
मंद मधुर मुस्काया है।
मां की आंखों में करुणा है
पिता के उर में मान,
बहना की राखी में बसता
हर भाई का अभिमान ।
धागा तो ये छोटा होता,
पर,भाव बहुत अनमोल है,
इसमें दुआएं बहन की होती
इसमें भाई का मोल है।
राखी की एक गांठ मात्र से
पूरा बचपन बंध जाता है,
जब बहन_ भाई को राखी बांधे
फिर से आंगन खिल जाता है।
समझो राखी की गरिमा को
शब्दों से परे जो होती है,
ससुराल बसी बहना की आंखे
चैन से ना सो पाती है।
बचपन की वो मीठी यादें
आकर बहुत सताती है,
भाई की वो सूनी कलाई
रह- रहकर तड़पाती है।
किससे कहे वो मन की पीड़ा
कोई नहीं समझ सकता,
खुद में रोकर खुद चुप होती
ये गम कोई बांट नहीं सकता ।
डॉo संजुला सिंह “संजू”
जमशेदपुर
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