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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 14 Jul 2026 7:59 PM |   164 views

लोकगीत हमारी सांस्कृतिक पहचान और लोकजीवन की आत्मा हैं : डॉ राकेश

गोरखपुर। संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के सहयोग से शारदा संगीतालय द्वारा आयोजित दस दिवसीय पारम्परिक लोकगीत कार्यशाला के तीसरे दिन प्रतिभागियों ने चर्चित मिर्जापुरी कजरी “सेजिया पे लोटे काला नाग हो, कचौड़ी गली सून कईला बलमू…” को पूरे मनोयोग एवं उत्साह के साथ सीखा। ढोलक पर श्यामसुन्दर हंसलोना ने प्रभावी संगत कर प्रशिक्षण को और अधिक जीवंत बनाया। कार्यशाला में आज 42 प्रतिभागियों ने सहभागिता की।
 
कार्यशाला के प्रशिक्षक एवं लोक कला साधक डॉ राकेश श्रीवास्तव ने कहा,
 
“लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परम्परा और लोकजीवन की जीवंत धरोहर हैं। इनमें हमारी सामाजिक स्मृतियाँ, लोकसंस्कार और जीवन-मूल्य सुरक्षित हैं।”
“आज की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और विलुप्त होती लोक परम्पराओं का संरक्षण करने के उद्देश्य से इस कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। जब युवा लोकगीत सीखेंगे, तभी हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह सकेगी।”
 
डॉ श्रीवास्तव ने बताया कि कार्यशाला में कजरी के विभिन्न स्वरूपों के साथ-साथ संस्कार गीत, ऋतु गीत तथा तीज-त्योहारों पर गाए जाने वाले पारम्परिक लोकगीतों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे प्रतिभागी लोकसंगीत की विविध विधाओं से परिचित हो सकें।
 
उन्होंने बताया कि यह कार्यशाला 21 जुलाई तक चलेगी, जिसमें प्रतिदिन पारम्परिक लोकसंगीत की विभिन्न विधाओं का प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। कार्यशाला में प्रतिभागियों का उत्साह निरंतर बढ़ रहा है, जो लोकसंस्कृति के प्रति जागरूकता और संरक्षण की भावना का सकारात्मक संकेत है।
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