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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 29 Jun 2026 7:39 PM |   117 views

किसान से किसान तक: कृषि संचार के वैज्ञानिक तरीके

भारतीय कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ ज्ञान केवल कृषि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों या कृषि विज्ञान केन्द्रों तक सीमित नहीं है। खेतों में काम करने वाला किसान भी अपने अनुभवों से प्रतिदिन नए प्रयोग करता है, समस्याओं का समाधान खोजता है और अपनी परिस्थितियों के अनुसार खेती की नई तकनीक विकसित करता है। यही कारण है कि भारत में किसान स्वयं एक चलता-फिरता कृषि विश्वविद्यालय है।
 
पिछले एक दशक में कृषि संचार का स्वरूप तेजी से बदला है। पहले जानकारी गाँव की चौपाल, मंडी या पड़ोसी किसानों तक सीमित रहती थी, जबकि आज व्हाट्सएप, फेसबुक, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से एक किसान का अनुभव कुछ ही मिनटों में पूरे देश तक पहुँच जाता है।
यह परिवर्तन जितना सकारात्मक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है।आज अधिकांश कृषि सलाह संदर्भ के बिना साझा की जा रही है। परिणाम यह होता है कि जो तकनीक एक क्षेत्र में अत्यंत सफल है, वही दूसरे क्षेत्र में असफल हो जाती है। कई बार किसान यह मान लेते हैं कि यदि किसी राज्य में किसी फसल से उत्कृष्ट परिणाम मिले हैं, तो वही तकनीक पूरे देश में समान रूप से सफल होगी। यही सोच अनेक आर्थिक और तकनीकी समस्याओं का कारण बनती है।
 
कृषि विज्ञान हमें सिखाता है कि किसी भी तकनीक का मूल्यांकन केवल उसके परिणाम से नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों से किया जाता है जिनमें वह परिणाम प्राप्त हुआ। इसीलिए आज आवश्यकता केवल कृषि ज्ञान की नहीं, बल्कि “वैज्ञानिक कृषि संचार”की है।
 
सदियों पहले लोककवि घाघ ने भी यही बात सरल शब्दों में कही थी:
“देश, काल अरु पात्र को, देख कर कीजे काम।
घाघ कहैं पछिताइहौ, बिगरि जाइ सब नाम।।”
अर्थात खेती हो या जीवन का कोई भी कार्य, सफलता केवल तकनीक से नहीं मिलती, बल्कि सही स्थान, सही समय और सही परिस्थितियों में उसी तकनीक के प्रयोग से मिलती है। आधुनिक कृषि विज्ञान इसे Genotype × Environment × Management (G×E×M) का प्रभाव कहता है, जबकि घाघ ने इसे सदियों पहले लोकभाषा में समझा दिया था।
 
कृषि में संदर्भ सबसे महत्वपूर्ण क्यों है?
चिकित्सा विज्ञान में यदि कोई चिकित्सक केवल यह कह दे कि “यह दवा बहुत अच्छी है”, तो कोई भी समझदार व्यक्ति उसे बिना बीमारी, उम्र और स्वास्थ्य की स्थिति जाने स्वीकार नहीं करेगा।
ठीक यही सिद्धांत कृषि पर भी लागू होता है।
 
यदि कोई किसान लिखता है कि “1 किलो बीज 1 एकड़ के लिए पर्याप्त है” या “2 सिंचाई में शानदार उत्पादन मिला”, तो यह जानकारी तब तक अधूरी है जब तक उसके साथ स्थान, जलवायु, मिट्टी, किस्म और प्रबंधन का विवरण न दिया जाए।
 
कृषि में “क्या किया” से अधिक महत्वपूर्ण है “कहाँ, कब और किन परिस्थितियों में किया।”
 
किसान जानकारी साझा करते समय सबसे अधिक कहाँ गलती करते हैं?
स्थानीय नाप-तौल का प्रयोग-
यह सबसे सामान्य और सबसे बड़ी गलती है।भारत में बीघा, कट्ठा, बिस्वा, गुंठा, नाली जैसी क्षेत्रीय इकाइयाँ प्रत्येक क्षेत्र में अलग-अलग हैं। कई स्थानों पर एक बीघा लगभग आधा एकड़ है तो कहीं दो-तिहाई, कहीं एक चौथाई और कहीं इससे भी अलग।
 
यदि कोई किसान लिखता है कि “1 बीघा में 1 किलो बीज पर्याप्त है”, तो दूसरे राज्य का किसान उसी सलाह का उपयोग करके पूरी तरह गलत परिणाम प्राप्त कर सकता है।
 
इसीलिए कृषि संचार की पहली शर्त है कि सभी तकनीकी जानकारी “एकड़ अथवा हेक्टेयर” में दी जाए। हरेक क्षेत्र मे किसानों को ये पता होता कि उनके यहाँ कितने बीघे का एकड़ होता है। 
 
बीज की मात्रा बताना, उद्देश्य नहीं-
केवल यह लिख देना कि “1 किलो बीज काफी है” वैज्ञानिक जानकारी नहीं है।
  • क्या वह बीज दाना उत्पादन के लिए है?
  • बीज उत्पादन के लिए?
  • सब्जी उत्पादन के लिए?
  • चारे के लिए?
  • नर्सरी तैयार करने के लिए
उद्देश्य बदलते ही बीज दर भी बदल जाती है।
 
किस्म का नाम छिपा देना-
कई किसान केवल फसल का नाम बताते हैं, जैसे “धान”, “गेहूँ”, “सरसों” या “टमाटर”। जबकि वास्तविक अंतर किस्मों में होता है।
2 किस्मों के बीच परिपक्वता अवधि, उत्पादन, गुणवत्ता, रोग प्रतिरोध, सिंचाई आवश्यकता और बाजार मूल्य में अत्यधिक अंतर हो सकता है। इसलिए कृषि अनुभव तभी उपयोगी होगा जब उसमें किस्म का स्पष्ट उल्लेख हो।
 
स्थान, मिट्टी और जलवायु का उल्लेख न करना-
  • यही वह बिंदु है जहाँ सबसे अधिक भ्रम उत्पन्न होता है।
  • उदाहरण के लिए शरबती गेहूँ की उत्कृष्ट गुणवत्ता मध्य भारत की विशिष्ट जलवायु में सीमित सिंचाई के साथ विकसित होती है।
  • यदि यही सलाह गुजरात जैसे अधिक गर्म एवं तीव्र वाष्पीकरण वाले क्षेत्र में लागू कर दी जाए तो फसल दुग्धावस्था तक पहुँचने से पहले ही नमी के अभाव का सामना कर सकती है।
  • इसी प्रकार किसी फल की मिठास, किसी गेहूँ की रोटी की गुणवत्ता अथवा किसी धान की सुगंध केवल उसकी किस्म पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मिट्टी, तापमान, दिन की लंबाई और जलवायु भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए किसी भी तकनीक के साथ उसका भौगोलिक संदर्भ अवश्य दिया जाना चाहिए।
“देश, काल अरु पात्र को, देख कर कीजे काम।
घाघ कहैं पछिताइहौ, बिगरि जाइ सब नाम।।”
घाघ कहते हैं कि किसी भी कार्य को करने से पहले स्थान (देश), समय (काल) और परिस्थितियों (पात्र) को अवश्य समझ लेना चाहिए। इनके बिना किया गया कार्य अपेक्षित परिणाम नहीं देता और अंत में पछताना पड़ता है।
 
 उर्वरकों की मात्रा बताना, पोषक तत्व नहीं-
  • 2 बोरी NPK डाल दी। यह जानकारी अधूरी है।
बेहतर होगा यदि किसान यह बताए कि कुल नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश कितनी मात्रा में दी गई। इससे अलग-अलग क्षेत्रों के किसान अपनी उपलब्ध उर्वरकों के अनुसार उसी पोषण स्तर को प्राप्त कर सकते हैं।
 
केवल ब्रांड बताना-
  • कृषि रसायनों के ब्रांड पूरे देश में अलग-अलग हो सकते हैं।
  • लेकिन सक्रिय तत्व (Active Ingredient) एक ही रहता है।
  • यदि किसान सक्रिय तत्व बताए तो वही जानकारी पूरे भारत में उपयोगी बन जाती है।
 
दवा की मात्रा तो बता दी, पानी की मात्रा नहीं-
“30 मिली दवा डाल दी।” यह जानकारी भी अधूरी है। दवा की मात्रा तभी अर्थपूर्ण होती है जब उसके साथ यह भी लिखा जाए कि वह कितने लीटर पानी में घोली गई थी। कभी यह 16लीटर स्प्रे टैंक वाले किसान 25 लीटर वाले किसान टंकी रखे किसान को कभी 300 लीटर टंकी रखे ट्रेक्टर से छिड़कने वाले किसान को बता रहे होते।
 
एक क्षेत्र की सफलता को पूरे देश का नियम मान लेना-
  • यह अत्यंत सामान्य भूल है।
  • कई किस्में किसी विशेष क्षेत्र में असाधारण उत्पादन देती हैं लेकिन दूसरे क्षेत्र में रोगों और कीटों से अत्यधिक प्रभावित हो जाती हैं।
उदाहरण के लिए विष्णु भोग जैसे सुगंधित धान की बाजार में विशेष मांग है। लेकिन इसकी लंबी अवधि के कारण कई क्षेत्रों में जब अन्य धान की कटाई हो चुकी होती है, तब यह फसल दुग्धावस्था में होती है। यही समय अनेक कीटों और रोगों के लिए सबसे अनुकूल होता है, जिससे इसकी सुरक्षा अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है। इसलिए केवल उत्पादन या स्वाद के आधार पर किसी किस्म की अनुशंसा करना पर्याप्त नहीं है। उसकी अवधि, स्थानीय अनुकूलता, रोग-कीट की संवेदनशीलता और प्रबंधन भी साथ बताना आवश्यक है।
 
एक वर्ष के अनुभव को अंतिम सत्य मान लेना-
  • कृषि में हर वर्ष मौसम बदलता है।
  • वर्षा बदलती है।
  • तापमान बदलता है।
  • बाजार बदलता है।
इसलिए एक वर्ष की सफलता या असफलता को सार्वभौमिक नियम नहीं माना जा सकता।
 
बिना सत्यापन के जानकारी आगे भेज देना-
  • आज सोशल मीडिया पर हजारों कृषि संदेश प्रतिदिन प्रसारित होते हैं।
  • यदि प्रत्येक किसान किसी भी संदेश को साझा करने से पहले उसके स्रोत और वैज्ञानिक आधार की पुष्टि कर ले, तो गलत जानकारी के प्रसार को काफी हद तक रोका जा सकता है।
 
वैज्ञानिक कृषि संचार का सरल प्रारूप-
यदि प्रत्येक किसान अपना अनुभव साझा करते समय निम्न जानकारी अवश्य लिखे, तो उसका अनुभव पूरे देश के किसानों के लिए उपयोगी बन सकता है।
* स्थान (जिला एवं राज्य)
* फसल एवं किस्म
* मिट्टी का प्रकार
* बुवाई की तिथि
* क्षेत्रफल (एकड़/हेक्टेयर)
* बीज दर
* पौधों की दूरी
* उर्वरक एवं सिंचाई प्रबंधन
* दवा का सक्रिय तत्व
* उत्पादन (क्विंटल प्रति एकड़)
* बाजार मूल्य
* विशेष परिस्थितियाँ
 
कृषि केवल तकनीकों का विज्ञान नहीं है, बल्कि परिस्थितियों का भी विज्ञान है। इसलिए किसी भी अनुभव का वास्तविक मूल्य तभी है जब उसके साथ उसका पूरा संदर्भ भी साझा किया जाए।
यदि भारत का किसान वैज्ञानिक ढंग से कृषि संचार करना सीख जाए, तो लाखों छोटे-छोटे अनुभव मिलकर ऐसी राष्ट्रीय ज्ञान-संपदा बन सकते हैं, जिसका लाभ हर राज्य, हर जलवायु और हर किसान को मिलेगा। कृषि में ज्ञान तभी उपयोगी है जब वह सही संदर्भ के साथ साझा किया जाए।
 
“अनुभव सफलता देता है, लेकिन संदर्भ के साथ साझा किया गया अनुभव समाज को सफलता देता है। यही वैज्ञानिक कृषि संचार का मूल उद्देश्य है।”
 
डॉ. शुभम कुमार कुलश्रेष्ठ ,विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापक – उद्यान विभाग
(कृषि संकाय), रविन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, रायसेन, मध्य प्रदेश
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