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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 29 Jun 2026 6:48 PM |   45 views

कबीर की योगी-छवि साहित्य की समालोचना से क्यों प्राय: अनुपस्थित रही

साधो, सहज समाधि भली।
गुरु प्रताप जा दिन ते उपजी, दिन-दिन अधिक चली॥
 
( यह कबीर के सहज योग का मूल सूत्र माना जाता है। यहाँ समाधि किसी कठिन हठयोग का परिणाम नहीं, बल्कि गुरु-कृपा से जागृत सहज चेतना है।
 
 अवधू, मेरा मन मतवारा।
उन्मनि चढ़्या गगन रस पीवै, त्रिभुवन भया उजियारा॥
 
( यहाँ उन्मनी अवस्था का उल्लेख है, जो योग की उच्च चेतना का प्रतीक है)
 
 इड़ा पिंगला ताना भरनी, सुषुम्ना तार से बीनी चदरिया॥
 
( यह अत्यंत प्रसिद्ध पद “झीनी-झीनी बीनी चदरिया” का अंश है। इसमें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों का प्रतीकात्मक प्रयोग हुआ है। कबीर शरीर को साधना का उपकरण मानते हैं, लक्ष्य नहीं )
 
गगन मंडल में बाजत डंका, अनहद शब्द सुहावा।
 
( यह अनहद नाद की अनुभूति का संकेत है, जो कबीर के योग का केंद्रीय अनुभव है)
 
 सुरति समानी निरति में, निरति रही निरधार।
सुरति निरति परचा भया, तब खुले स्वयंभू द्वार॥
 
 
( यहाँ सुरति (चेतना) और निरति (लय) के योग का वर्णन है। यह कबीर की सूक्ष्म योग-भाषा का श्रेष्ठ उदाहरण है )
 
अवधू, गगन मंडल घर कीजे।
अमृत झरे सदा सुख उपजे, बंक नालि रस पीजे॥
 
( यहाँ ‘बंक नालि’ सुषुम्ना का प्रतीक मानी जाती है और अमृत आध्यात्मिक अनुभूति का।)
 
 शून्य महल में घर किया, बाजे शब्द रसाल।
 
( कबीर के ‘शून्य’ का अर्थ रिक्तता नहीं, बल्कि परम चेतना का आयाम है।)
 
 मन ही योगी, मन ही जोग।
मन ही भोगी, मन संजोग॥
 
( यह पंक्ति कबीर की योग-दृष्टि का सार प्रस्तुत करती है। मन ही बंधन का कारण है और मन ही मुक्ति का साधन।)
 
कबीर की काव्य-प्रतिभा पर जितना लिखा गया है, उनकी योगी छवि पर उतना गंभीर और स्वतंत्र चिंतन नहीं हुआ। यह स्थिति इसलिए अधिक आश्चर्यजनक है कि स्वयं कबीर की वाणी योगिक शब्दावली, साधना-प्रतीकों और आध्यात्मिक अनुभूतियों से भरी हुई है। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, अनहद, शून्य, सहज, गगन, अमृत, उलटी धारा, सुरति और निरति जैसे असंख्य संकेत उनकी रचनाओं में बार-बार उपस्थित होते हैं। फिर भी साहित्यिक समालोचना ने प्रायः कबीर को निर्गुण भक्ति, सामाजिक विद्रोह या लोकचेतना के कवि के रूप में अधिक पढ़ा, जबकि उनके योग-दर्शन को एक स्वतंत्र वैचारिक संरचना के रूप में अपेक्षित महत्त्व नहीं मिला।
 
इस उपेक्षा का पहला कारण यह है कि आधुनिक हिंदी आलोचना का निर्माण मुख्यतः साहित्यिक और सामाजिक प्रश्नों के आधार पर हुआ। आलोचकों की रुचि भाषा, समाज, इतिहास और विचारधारा में अधिक रही। योग को प्रायः धार्मिक या सांप्रदायिक साधना का विषय मान लिया गया। फलतः कबीर के योग-संबंधी प्रतीकों को काव्य-अलंकरण या रहस्यवाद की भाषा समझकर छोड़ दिया गया। यह दृष्टि कबीर के अनुभव-संसार की गहराई तक नहीं पहुँच सकी।
 
दूसरा कारण यह है कि कबीर के योग को प्रायः नाथपंथ की परंपरा के अंतर्गत रखकर देखा गया। निस्संदेह कबीर पर नाथ-सिद्ध परंपरा का प्रभाव है परंतु उनका योग केवल नाथयोग का पुनरावर्तन नहीं है। उन्होंने योग को अपने अनुभव से नया अर्थ दिया। उन्होंने योग को शरीर-केंद्रित अनुशासन से आगे बढ़ाकर चेतना, प्रेम और सहजता का मार्ग बनाया। जब आलोचना ने उन्हें केवल प्रभावों की दृष्टि से देखा, तब उनकी मौलिक योग-दृष्टि ओझल हो गई।
 
तीसरा कारण कबीर की प्रतीकात्मक भाषा है। उनकी योग-संबंधी अभिव्यक्तियाँ प्रत्यक्ष नहीं बल्कि संकेतात्मक हैं। वे व्यवस्थित दार्शनिक ग्रंथ नहीं लिखते बल्कि अनुभव की भाषा बोलते हैं। इसलिए उनके योग को समझने के लिए केवल साहित्यिक संवेदना पर्याप्त नहीं; योग-दर्शन, संत परंपरा और भारतीय आध्यात्मिक शब्दावली का भी ज्ञान अपेक्षित है। अनेक आलोचकों ने इस अंतर्विषयी चुनौती को स्वीकार नहीं किया।
 
एक कारण यह भी है कि कबीर की सामाजिक चेतना इतनी प्रखर है कि उसने उनकी योगी चेतना को कई बार ढँक दिया। उनकी निर्भीक वाणी, रूढ़ियों पर प्रहार और सामाजिक असमानताओं की आलोचना ने स्वाभाविक रूप से अधिक ध्यान आकर्षित किया। परिणामस्वरूप कबीर के भीतर का साधक, ध्यानशील योगी और आत्मानुभूति का कवि अपेक्षाकृत कम दिखाई दिया। जबकि वस्तुतः उनकी सामाजिक दृष्टि भी उनके योगानुभव से ही निर्मित होती है। उनके लिए बाहरी परिवर्तन का आधार भी अंतःकरण का रूपांतरण है।
 
यह भी ध्यान देने योग्य है कि कबीर ने स्वयं को किसी व्यवस्थित योग-संप्रदाय का प्रवक्ता नहीं बनाया। उन्होंने न तो योगसूत्र की शैली में सिद्धांत प्रस्तुत किए और न ही साधना-पद्धति का क्रमबद्ध विवेचन किया। उनका योग उनकी वाणी में बिखरा हुआ है। वह दोहों, साखियों और पदों के भीतर संकेतों के रूप में उपस्थित है। इसलिए उसे एक सूत्र में बाँधने का श्रम आलोचना को करना पड़ता है। यह श्रम अपेक्षाकृत कम हुआ।
 
समकालीन साहित्यिक विमर्शों ने भी कबीर को अनेक नए संदर्भों में पढ़ा किंतु योग की दृष्टि से उनका पुनर्पाठ अभी पर्याप्त नहीं हुआ है। परिणामस्वरूप कबीर की वहतत्त्व जिसमें वे एक मौलिक योग-द्रष्टा के रूप में सामने आते हैं, अभी भी आंशिक रूप से अनावृत्त है।
 
वास्तव में कबीर की योगी छवि उनकी काव्य-दृष्टि की आधारभूमि है। उनके यहाँ सहज, शून्य, अनहद, नाम, सुरति और आत्मानुभूति केवल आध्यात्मिक शब्द नहीं बल्कि उनकी समूची काव्य-संरचना के केंद्रीय तत्त्व हैं। यदि इनकी उपेक्षा की जाती है तो कबीर का काव्य अपने पूर्ण अर्थ में नहीं खुलता। इसलिए भविष्य की कबीर-समालोचना का एक महत्त्वपूर्ण दायित्व यह है कि वह कबीर को केवल संत, समाज-सुधारक या कवि के रूप में नहीं बल्कि एक मौलिक योग-द्रष्टा के रूप में भी समझे। तभी उनकी रचनाओं की आंतरिक संरचना, प्रतीक-व्यवस्था और आध्यात्मिक संवेदना का सम्यक् मूल्यांकन संभव होगा।
 
कबीर की योगी छवि की उपेक्षा का एक कारण भारतीय साहित्यिक आलोचना की पद्धति भी रही है। लंबे समय तक आलोचना का आग्रह ऐतिहासिकता, समाजशास्त्र, भाषिक संरचना और वैचारिक विश्लेषण पर अधिक रहा। इन दृष्टियों ने कबीर के अनेक महत्त्वपूर्ण पक्षों को उद्घाटित किया, किंतु योग की अनुभूति को केवल वैचारिक उपकरणों से नहीं समझा जा सकता। योग अनुभव का विषय है और अनुभव की भाषा अनेक बार तर्क की सामान्य सीमाओं का अतिक्रमण करती है। इसलिए कबीर के योग को समझने के लिए ऐसी आलोचना-पद्धति की आवश्यकता है, जिसमें साहित्य, दर्शन और साधना तीनों का समन्वय हो।
 
कबीर के यहाँ ‘सहज’ केवल एक शब्द नहीं बल्कि संपूर्ण आध्यात्मिक दृष्टि का केंद्र है। इसी प्रकार ‘अनहद’ कोई काव्यात्मक कल्पना नहीं बल्कि एक अनुभूत चेतना का संकेत है। ‘शून्य’ रिक्तता नहीं बल्कि अस्तित्व की पूर्णता का बोध है। यदि इन शब्दों को केवल काव्य-प्रतीक मानकर पढ़ा जाए, तो उनकी आधी शक्ति ही सामने आती है। इनका वास्तविक अर्थ योगानुभव की भूमि पर ही उद् घाटित होता है। दुर्भाग्यवश अनेक व्याख्याएँ इस भूमियह ने तक पहुँचे बिना ही निष्कर्ष निर्मित कर लेती हैं।
 
कबीर का योग किसी संप्रदाय की पुनरावृत्ति नहीं करता। वे न तो पतंजलि के सूत्रों की व्याख्या कर रहे हैं, न नाथयोग का अनुकरण और न ही वेदांत का भाष्य लिख रहे हैं। वे इन सभी परंपराओं से संवाद करते हैं पर अंततः अपनी अनुभूति के आधार पर एक स्वतंत्र योग-दृष्टि का निर्माण करते हैं। उनकी साधना का केंद्र ‘सहज चेतना’ है, जहाँ योग किसी तकनीक का नहीं बल्कि जीवन की स्वाभाविक परिपक्वता का पर्याय बन जाता है। इस मौलिकता को पहचानना अभी शेष है।
 
कबीर की कविता में योग का संबंध सौंदर्यबोध से भी है। उनके यहाँ आत्मानुभूति केवल दार्शनिक विचार नहीं बल्कि काव्यात्मक अनुभूति भी है। अनहद की ध्वनि, अंतराकाश की विशालता, प्रेम की अग्नि और सहज की शांति, ये सब मिलकर एक ऐसे काव्य-संसार का निर्माण करते हैं जहाँ योग और कविता एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। इस संबंध पर भी अपेक्षित गंभीरता से विचार नहीं हुआ है। यदि कबीर के काव्यशिल्प का अध्ययन उनकी योग-दृष्टि के साथ किया जाए, तो उनकी काव्यात्मकता के अनेक नए आयाम उद्घाटित हो सकते हैं।
 
आज आवश्यकता इस बात की है कि कबीर की योगी छवि को किसी रहस्यवादी आवरण में नहीं बल्कि उनकी संपूर्ण रचनात्मक चेतना के केंद्र के रूप में देखा जाए। इससे यह स्पष्ट होगा कि उनकी सामाजिक निर्भीकता, आध्यात्मिक स्वतंत्रता, भाषिक सादगी और काव्यात्मक ऊँचाई, ये सब अलग-अलग उपलब्धियाँ नहीं हैं। इन सबका मूल स्रोत वही योगानुभूति है जिसने कबीर को भीतर से रूपांतरित किया। कबीर का कवि, कबीर का संत और कबीर का चिंतक, इन तीनों का आधार अंततः कबीर का योगी है।
 
इसलिए अब समय आ गया है कि कबीर-अध्ययन में उनकी योगी भूमि को परिधि से उठाकर केंद्र में स्थापित किया जाए। यह केवल एक उपेक्षित पक्ष की पुनर्स्मृति नहीं होगी बल्कि कबीर की समग्रता को समझने की दिशा में एक आवश्यक बौद्धिक कदम भी होगा। जब तक कबीर के योग को उनकी काव्य-दृष्टि, प्रतीक-योजना और आध्यात्मिक अनुभव के साथ जोड़कर नहीं पढ़ा जाएगा, तब तक उनकी रचनाओं का वह आंतरिक आलोक पूरी तरह उद् घाटित नहीं होगा जो उन्हें भारतीय साहित्य की सबसे विलक्षण और सबसे गहन आवाज़ों में स्थान दिलाता है।
 
  • कबीर ने योग को शरीर की क्रिया से अधिक चेतना की अवस्था के रूप में प्रतिष्ठित किया।
  • कबीर का योग साधना का प्रदर्शन नहीं, आत्मानुभूति का मौन विस्तार है।
  • कबीर के यहाँ योग का अंतिम लक्ष्य सिद्धि नहीं, सहजता की प्राप्ति है।
  • कबीर ने योग को रहस्य नहीं रहने दिया; उसे जीवन की स्वाभाविक अनुभूति बना दिया।
  • कबीर का योग बाह्य अनुशासन से अधिक अंतःकरण के परिष्कार पर आधारित है।
  • कबीर की योग-दृष्टि में प्रेम और समाधि परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
  • कबीर ने योग को संप्रदाय की सीमाओं से मुक्त कर मानवीय चेतना की सार्वभौमिक साधना बना दिया।
कबीर के लिए योग आत्मा का विस्तार नहीं, आत्मा का उद्घाटन है। कबीर का योग अनुभूति की भाषा बोलता है| इसलिए उसे केवल शास्त्रों से नहीं समझा जा सकता। कबीर ने योग को जीवन से अलग नहीं किया, बल्कि जीवन को ही योग की भूमि बना दिया। कबीर की वाणी में योग दर्शन नहीं, अनुभव का स्पंदन बनकर उपस्थित होता है। कबीर का योग भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का पुनराविष्कार है, पुनरुक्ति नहीं। सहज, शून्य और अनहद, कबीर के योग के तीन ऐसे बिंदु हैं जहाँ कविता और साधना एकाकार हो जाती हैं।
 
कबीर के योग को समझे बिना उनके काव्य की आध्यात्मिक संरचना अधूरी रह जाती है।कबीर ने योग को कठिन नहीं बनाया, उन्होंने उसे गहरा बनाया।
 
–प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” 
 
प्रो. एवं डीन, नव नालंदा महाविहार, सम विश्वविद्यालय ( संस्कृति मंत्रालय,भारत सरकार), नालंदा 
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