अल नीनो/ला नीना-बदलता मानसून और भारतीय खेती
भारतीय कृषि की असली धूरी मानसून है, और मानसून की चाल अब पहले जैसी भरोसेमंद नहीं रही। खेत में खड़े किसान के लिए “सूखा” केवल गर्मी का मौसम नहीं होता, बल्कि वह स्थिति है जब जून से सितम्बर के बीच—यानी बरसात के महीनों में—बारिश का लंबा अंतराल आ जाए। इसे ही व्यवहारिक रूप में मिड-सीजन ड्रॉट कहा जाता है। ऐसे समय में फसलें सबसे अधिक संवेदनशील होती हैं, क्योंकि यही उनका बढ़वार और दाना बनने का समय होता है।कुछ प्रमुख शब्द और उनके सरल अर्थ-
अल नीनो (El Niño): प्रशांत महासागर के पानी का असामान्य रूप से गर्म होना, जिससे भारत में मानसून कमजोर पड़ सकता है।
ला नीना (La Niña): महासागर का सामान्य से ठंडा होना, जिससे भारत में अधिक वर्षा या बाढ़ की स्थिति बन सकती है।
मिड-सीजन ड्रॉट (Mid-season drought): मानसून के दौरान 2–3 सप्ताह या अधिक समय तक वर्षा न होना।
ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect): वातावरण में CO₂, मीथेन जैसी गैसों के बढ़ने से धरती का तापमान बढ़ना।
जलभराव (Waterlogging): खेत में पानी का रुक जाना जिससे जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिलती।
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्यतः केरल तट पर लगभग 1–4 जून के बीच प्रवेश करता है। इसके बाद यह धीरे-धीरे 3–4 हफ्तों में पूरे देश में फैलता है और जुलाई तक अधिकांश हिस्सों को कवर कर लेता है। लेकिन अब इस क्रम में अनियमितता दिख रही है—कहीं देर से शुरुआत, कहीं बीच में लंबा ब्रेक, तो कहीं अचानक भारी वर्षा।
यहीं पर अल नीनो और ला नीना अपना असर दिखाते हैं। अल नीनो के वर्षों में मानसून कमजोर, देर से या असमान हो सकता है। ला नीना के दौरान वर्षा अधिक और कभी-कभी अत्यधिक हो जाती है, जिससे बाढ़ और जलभराव की समस्या बढ़ती है।
मानव गतिविधियाँ और बढ़ती समस्या-
प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ हमारी अपनी गतिविधियाँ भी स्थिति को गंभीर बना रही हैं:
ग्रीनहाउस प्रभाव: उद्योग, वाहन और ऊर्जा खपत से बढ़ती गैसें तापमान बढ़ा रही हैं, जिससे मौसम चक्र अस्थिर हो रहा है।
फसल अवशेष जलाना (Stubble burning): इससे CO₂ और अन्य हानिकारक गैसें बढ़ती हैं, जो न केवल प्रदूषण बल्कि वर्षा चक्र को भी प्रभावित करती हैं। मिट्टी का पोषक मान और सूक्ष्म जीव खत्म हो रहे वो अलग।
पेड़ों और बगीचों की कमी: वृक्ष वर्षा चक्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लगातार कटान और नए पौधारोपण की कमी से स्थानीय जलवायु प्रभावित होती है।
खेती पर प्रभाव—जमीनी सच्चाई-
धान: मिड-सीजन ड्रॉट में सबसे ज्यादा प्रभावित, क्योंकि इसे लगातार पानी चाहिए।
दालें और तिलहन: सूखा सहन कर सकती हैं, लेकिन अत्यधिक वर्षा में नुकसान होता है।
सब्जियाँ: तापमान और नमी दोनों के प्रति संवेदनशील, इसलिए उत्पादन में उतार-चढ़ाव अधिक।
बागवानी फलदार फसलें: अनियमित वर्षा से फूल और फल झड़ना आम समस्या बन रही है।, उकठा, गमोसिस जैसी बिमारी और कीड़े का प्रकोप अलग बढ़ते हैँ। पोषण सूखे मे अनुपलब्ध और ज्यादा बारिश मे भूमिगत जल मे रिसाव सँग नष्ट होने का प्रभाव बढ़ जाता है।
समाधान—व्यवहारिक और टिकाऊ रास्ते-
1. फसल और किस्म का सही चुनाव-
धान के स्थान पर कम पानी वाली फसलें जैसे बाजरा, ज्वार, अरहर अपनाना। जल्दी पकने वाली और सूखा/जलभराव सहनशील किस्मों का चयन। सुखा और ज्यादा नमी सहने वाली फसलों जैसे गराडू, ग्वारफली, और अरबी, स्वीट कॉर्न जैसी फसल का चयन ज्यादा बरसात की स्थिति मे किया जा सकता है।
* खेत तालाब (Farm pond) बनाना
* वर्षा जल संचयन, भूमिगत जल प्रणाली को वापस पानी लौटाना
* ड्रिप और स्प्रिंकलर का उपयोग
* मेड़बंदी और कंटूर फार्मिंग
3. फसल विविधीकरण और एकीकृत खेती-
अनाज के साथ फल, सब्जी, मसाले और पशुपालन जोड़ना। खराब हो रहे फसल को अन्य मॉडल प्रसंस्करण मे बदलने से आय स्थिर/सुनिश्चित रहती है।
4. मृदा स्वास्थ्य सुधार-
जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट और मल्चिंग से मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है। यह सूखा और अधिक वर्षा दोनों स्थितियों में मदद करता है।
5. अवशेष प्रबंधन और वृक्षारोपण-
फसल अवशेष जलाने की जगह उनका कम्पोस्ट बनाना या मल्च के रूप में उपयोग करना। खेत की मेड़ों पर पेड़ लगाना, एग्रोफॉरेस्ट्री अपनाना। बायो गैस स्लरी से वापस खेत का पोषक मान लौटाना।
6. मौसम आधारित खेती-
अब हर किसान के पास मोबाइल है—मौसम पूर्वानुमान देखकर बुवाई, सिंचाई और दवा का निर्णय लेना चाहिए। ग्रीनहॉउस, शेडनेट, टपक और फुव्वारा सिंचाई विधियों को अपनाकर कम पानी मे भी फसल उत्पादन सुनिश्चिचत करना चाहिये।
आज का किसान केवल परंपराओं पर निर्भर नहीं रह सकता। मौसम की अनिश्चितता—चाहे वह अल नीनो हो या ला नीना—अब स्थायी चुनौती बन चुकी है। लेकिन सही जानकारी, थोड़ी योजना और संसाधनों के बेहतर उपयोग से इन चुनौतियों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।खेती को प्रकृति के साथ जोड़कर, उसे समझकर और उसके अनुरूप ढालकर ही हम भविष्य की कृषि को सुरक्षित बना सकते हैं। यही समय की मांग है—और यही एक समझदार किसान की पहचान भी।
डॉ. शुभम कुमार कुलश्रेष्ठ ,विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापक – उद्यान विभाग
(कृषि संकाय) , रविन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, रायसेन, मध्य प्रदेश
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