फगुआ
-परिचय दास ,प्रो. नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय ( संस्कृति मंत्रालय , भारत सरकार) , नालंदा |
फगुआ आता नहीं, उतरता है—जैसे किसी पुरानी स्मृति की पोटली अचानक खुल जाए और भीतर से रंग की धूल उड़कर हवा में घुलने लगे। खेतों में सरसों की आख़िरी पीली आहट बची रहती है, गेहूँ की बालियाँ दुपहर की धूप में धीमे-धीमे सिर हिलाती हैं, और आम के बौर में एक अनकहा वादा काँपता है। यह वही समय है जब हवा सिर्फ़ चलती नहीं, बोलती है; जब मिट्टी सिर्फ़ गंध नहीं देती, अपना मन खोलती है।
फगुआ का अर्थ केवल रंग नहीं। वह भीतर की परतों पर जमी हुई उदासी को उँगलियों से कुरेदता है। सर्दियों की चुप्पी, जो अलाव के धुएँ में लिपटी रहती थी, अब खुलकर आकाश में घुल जाती है। गाँव की पगडंडियों पर बच्चे ऐसे दौड़ते हैं मानो पृथ्वी आज ही बनी हो और उन्हें पहली बार अपनी एड़ियों की थाप सुनाई दे रही हो। कुएँ से पानी खींचती स्त्रियाँ अचानक गीत में उतर जाती हैं; गीत जैसे उनके कंधों पर रखे घड़ों का संतुलन साधता हो।
रंगों की अपनी राजनीति होती है, पर फगुआ में वे संन्यासी हो जाते हैं। लाल किसी की आँख में चुभता नहीं, हरा किसी खेत की सीमा नहीं पूछता, पीला किसी वर्ग का प्रतीक नहीं बनता। वे सब मिलकर एक ऐसी धुन बनाते हैं जिसमें मनुष्य का चेहरा अपने आप खुल जाता है। जैसे वर्षों से बंद खिड़की अचानक खुली हो और भीतर की धूप ने कमरे की धूल से दोस्ती कर ली हो।
मुझे याद आता है—बचपन में जब पहली बार गुलाल की थैली हाथ में आई थी, तो लगा था जैसे किसी ने एक छोटी-सी आकाशगंगा सौंप दी हो। हथेली पर रखा रंग केवल रंग नहीं था; वह विश्वास था कि इस संसार में कठोरता अंतिम सत्य नहीं। दादी की हँसी में तब एक अजीब-सी चमक होती थी, जैसे वे जानती हों कि मनुष्य की सारी क्रूरताओं के बावजूद उसके भीतर एक कोमल कोना बचा रहता है। फगुआ उसी कोने को पुकारता है।
ढोलक की थाप में एक आदिम लय छिपी रहती है। वह लय शरीर को याद दिलाती है कि वह केवल श्रम का उपकरण नहीं, आनंद का घर भी है। चौपाल पर बैठे बूढ़े जब फगुआ गाते हैं, तो उनके स्वर में समय की खुरदुराहट भी होती है और प्रेम की मुलायम परत भी। गीत में विरह भी है, मिलन भी; शिकायत भी है, शरारत भी। जैसे जीवन ने खुद को शब्दों में बदल लिया हो और शब्दों ने फिर से जीवन बन जाना स्वीकार कर लिया हो।
फगुआ में प्रकृति और मनुष्य का अंतर कुछ देर के लिए मिट जाता है। आम के पेड़ पर बैठी कोयल जब पहली बार कूकती है, तो लगता है जैसे उसने किसी के नाम का उच्चारण किया हो। आँगन में सूखते कपड़ों पर रंग की छींट पड़ जाए तो भी क्रोध नहीं आता; बल्कि लगता है कि वस्त्रों को भी इस उत्सव में दीक्षित होना चाहिए। यह दीक्षा बाहरी नहीं, भीतरी है—जहाँ हम अपने भीतर की धूसरता को पहचानते हैं और उसे रंग की हल्की थपकी से नरम कर देते हैं।
शहरों में फगुआ कभी-कभी प्लास्टिक की पिचकारियों और तेज़ संगीत के बीच खो जाता है। फिर भी, किसी अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ा बच्चा जब नीचे उड़ते रंग को विस्मय से देखता है, तो वही पुराना जादू लौट आता है। यह जादू बाज़ार से नहीं आता; वह स्मृति से आता है, उस सामूहिक अनुभव से जिसमें हम कुछ देर के लिए अपने नाम, पद, उपलब्धियाँ सब भूलकर केवल एक दूसरे का चेहरा पहचानते हैं।
फगुआ में एक जोखिम भी है। रंग जब चेहरे पर चढ़ता है तो पहचान धुँधली पड़ती है। शायद इसी धुँधलके से लोग डरते हैं। पर क्या पहचान का इतना आग्रह आवश्यक है? क्या हम कुछ क्षण के लिए अपने कठोर रेखांकन को ढीला नहीं छोड़ सकते? फगुआ यही पूछता है—धीरे से, मुस्कराते हुए। वह किसी पर आग्रह नहीं करता, बस रंग की एक चुटकी उछाल देता है। बाकी काम हवा करती है।
शाम ढलती है तो रंग धीरे-धीरे थमने लगते हैं। शरीर थक जाता है, पर मन में एक हल्की-सी चमक बची रहती है। स्नान के बाद भी कान के पीछे, गर्दन की सिलवटों में, नाखूनों के कोनों में रंग की पतली रेखा रह जाती है—जैसे स्मृति का कोई सूक्ष्म हस्ताक्षर। यह हस्ताक्षर बताता है कि हमने जीवन को केवल सहा नहीं, कुछ देर उसके साथ खेला भी है।
फगुआ दरअसल एक प्रश्न है—क्या हम अपने भीतर के सूखे वृक्ष को फिर से बौर आने देंगे? क्या हम अपनी कठोरता के बीच से थोड़ी-सी कोमलता निकाल सकेंगे? हर वर्ष यह प्रश्न नए सिरे से सामने आता है। और हर वर्ष, रंग की एक चुटकी हमारे उत्तर को लिख देती है—बिना शब्दों के, बिना घोषणा के।
जब अगली सुबह खेतों पर हल्की धूप उतरती है और आँगन में बचे हुए रंग की धूल झिलमिलाती है, तब लगता है कि संसार थोड़ा-सा बदल गया है। शायद सचमुच नहीं बदला, पर देखने की दृष्टि बदल गई है। फगुआ का यही चमत्कार है—वह बाहर से कम, भीतर से अधिक रंगता है। और भीतर रंग जाए तो बाहर की दुनिया भी कुछ कम कठोर लगने लगती है।
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