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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 28 Feb 2026 7:41 PM |   28 views

सत्य तब साकार होता है जब वह अहिंसा का वस्त्र पहनता है- प्रो. विश्वनाथ

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग में राजकीय बौद्ध संग्रहालय के सहयोग से चल रहे दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र को संबोधित करते हुए पद्मश्री प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने गांधी जी के हवाले से कहा कि सत्य ही ईश्वर है| सत्य तब साकार होता है जब वह अहिंसा का वस्त्र पहनता है|
 
उन्होंने कहा कि ‘धर्म’ एक अनूठा शब्द है. इसका अनुवाद दुनिया की हर भाषा में मिलेगा, लेकिन अवधारणा कहीं नहीं. सत्य का पर्याय है धर्म. मनुष्य जीवन की सभी भूमिकाओं में धर्म अनिवार्यतः मौजूद होता है| धर्म वह है जो मनुष्य को पशु से अलग करता है| चार पुरुषार्थों में धर्म सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, जो शेष तीन – अर्थ, काम व मोक्ष को नियंत्रित करता है| जो धर्म को मारता है उसे धर्म ही मारता है| धर्म सृष्टि का नियामक तत्व है| राम-रावण के महायुद्ध में विजय उसी की हुई जो धर्म के रथ पर सवार था| धर्म अपने मूल तत्व रूप में ऋत् अर्थात ब्रह्माण्डीय व्यवस्था की तरह है|
 
धर्म को समझने वाला व्यक्ति कभी भी धर्मनिरपेक्षता शब्द का प्रयोग नहीं करता है| गांधी जी धर्म को समझते थे इसीलिए उनके चिंतन में कहीं धर्मनिरपेक्ष शब्द नहीं मिलता| गाँधी जी ने धर्मविहीन राजनीति को पागलपन कहा| जो धर्म के ओरिजिनल टेक्स्ट को जानेगा, वही ऐसी बात कह सकता है|
 
मुख्य वक्तव्य देते हुए इतिहासविद प्रोफेसर विपुला दुबे ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में सत्य के एक होने पर भी भिन्न दृष्टि से देखने का प्रयत्न मिलता है| एक ही सत्य को भिन्न दृष्टि से देखना संशय नहीं, बल्कि दृष्टि, अधिकार व मनुष्य के स्वानुभूतिकी विविधता को स्वीकार करने का उदाहरण है| इन्हीं अर्थों में भारतीय ज्ञान परंपरा ज्ञान की विभिन्न धाराओं की उद्गमस्थली बन सकी| इस परंपरा में कभी भी वैचारिक कट्टरता को प्रश्रय नहीं दिया गया|
 
इसीलिए भारतीय ज्ञान परंपरा में न तो सत्य एक दिखाई पड़ता है और न ही ईश्वर. सबको अपने बुद्धि, विवेक के अनुसार अपने-अपने ईश्वर और सत्य को मानने की उदारता व सहिष्णुता मौजूद रही है| जबकि दुनिया की अन्य संस्कृतियों में मसलन सामी संस्कृति में एक ईश्वर, एक सत्य का कड़ा विधान देखने को मिलता है, जो उन्हें विश्व-चिंतन से अलग कर देता है| भारतीय चिंतन में सहिष्णुता की दृष्टि का प्रतिफलन न केवल भारतीय समाज, बल्कि राजशाही में भी देखने को मिलता है| छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व से 12वीं सदी तक एक भी राजा ऐसा नहीं मिलता जो अपनी प्रजा को किसी विशेष धार्मिक विचार को मानने के लिए विवश करता हो|
 
इतिहासविद प्रोफेसर राजवंत राव ने कहा कि यूरोप केंद्रित वर्चस्ववादी, सर्वग्रासी ज्ञानोदय की प्रतिक्रिया स्वरूप उसके विरुद्ध एक प्रति चेतना के रूप में भारतीय ज्ञान परंपरा विकसित होती है| इस परंपरा में देशजता है, मूल्य व परंपरा है| इस देशजता, मूल्य और परंपरा का समवेत स्वर भारतीय ज्ञान परंपरा में गूंज रहा है| उन्होंने कहा कि पुरापाषाणिक मानव प्रकृति, जीवन एवं समाज के संबंधों पर बहुत गहराई से सोच रहा था, जो उनके शैलचित्रों में प्रतिबिंबित होता है| इस चिंतन के माध्यम से उन्होंने अपनी विश्व-दृष्टि का निर्माण किया था| इन तथ्यों के आलोक में हम उन्हें आदिम कैसे कह सकते हैं? उनके चित्र हमें आदिमता की अवधारणा को पुनर्परिभाषित करने के लिए बाध्य करते हैं|
 
सिंधु घाटी सभ्यता में अन्य समकालीन सभ्यताओं की भांति कोई भी चुभने वाला स्मारक नहीं मिलता है| इससे सिद्ध होता है कि उस समय का शासन राजशाही से नहीं बल्कि गणतांत्रिक व्यवस्था से संचालित होता रहा होगा| उस सभ्यता के अब तक 1800 स्थल खोज लिए गए हैं लेकिन यह बहुत बड़ी बात है कि एक भी स्थल से युद्ध या हिंसा के प्रमाण नहीं मिले| गढ़ी (शासक वर्ग) और नगर (आमजन) क्षेत्रों के सभी उत्खनन में कहीं भी कुपोषित हड्डियां नहीं मिली हैं| पूरे इंडस वैली में स्वस्थ हड्डियों के साक्ष्य मिले हैं| इसका मतलब है कि उस समय आनुपातिक रूप से समान सामाजिक व्यवस्था थी जिसमें सबको पोषण मिल रहा था| यह तथ्य भारतीय ज्ञान परंपरा को विश्व मंच पर सबसे ऊंचे पायदान पर प्रतिष्ठित करता है|
 
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रोफेसर पूनम टंडन ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा से हमें यह सीख मिलती है कि ज्ञान को सीमाओं में बांधना उचित नहीं है| हमें धर्म के साथ कर्म को लेकर आगे बढ़ना चाहिए| धर्म समझने में कठिन हो सकता है लेकिन कर्म नहीं| भारतीय ज्ञान परंपरा में धर्म और कर्म दोनों सौंदर्य का विवेचन मिलता है|
 
इस सत्र का संचालन डॉ पद्मजा सिंह ने किया| स्वागत वक्तव्य प्राचीन इतिहास विभाग की अध्यक्ष प्रोफेसर प्रज्ञा चतुर्वेदी ने दिया| आभार ज्ञापन राजकीय बौद्ध संग्रहालय के निदेशक डॉ यशवंत सिंह राठौड़ ने किया|
 
इस अवसर पर प्रोफेसर अनुभूति दुबे, प्रोफेसर विमलेश मिश्रा, प्रोफेसर प्रत्यूष दुबे, प्रोफेसर केशव सिंह, डॉ रामवंत गुप्ता, डॉ संजय राम, डॉ कुलदीपक शुक्ला, डॉ संजीव, डॉ मनीष पांडेय, डॉ गरिमा सिंह, दो दुर्गावती यादव, डॉ रश्मि रानी, डॉ सुनीता पासवान, प्रो.रामप्यारे मिश्र, डॉ विनोद कुमार, डॉ, मणीन्द कुमार यादव समेत विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षक शोधार्थी पत्रकार व छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे|
 
प्राचीन भारतीय मुद्राओं की प्रदर्शनी बनी आकर्षण का केंद्र
राजकीय बौद्ध संग्रहालय द्वारा प्राचीन भारतीय मुद्राओं की प्रदर्शनी ने छात्र-छात्राओं एवं शोधार्थियों को विशेष रूप से आकर्षित किया| इस प्रदर्शनी में छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व से लेकर 12वीं शताब्दी तक की मुद्राएं प्रदर्शित की गई थीं|
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