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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 4 Feb 2026 7:08 PM |   389 views

आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप मुद्रा प्रणाली विकसित हुई-डॉ0 मणिन्द्र

गोरखपुर – प्राचीन भारतीय अभिलेख एवं मुद्राएं-अभिरूचि कार्यशाला’’ राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला के अन्तर्गत आज डॉ0 मणिन्द्र यादव प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, दी0द0उ0गो0 वि0वि0, गोरखपुर द्वारा ’’प्राचीन भारतीय मुद्राओं के निर्माण तकनीक एवं विकास’’ विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया गया।
 
उन्होंने अपने उद्बोधन में मानव सभ्यता में विनिमय व्यवस्था की शुरुआत पर प्रकाश डालते हुए सामान के बदले सामान की परम्परा से लेकर क्रमशः धातु मुद्राओं के विकास तक की ऐतिहासिक यात्रा को सरल एवं रोचक ढंग से प्रतिभागियों के समक्ष प्रस्तुत किया।
 
उन्होंने बताया कि किस प्रकार समय के साथ आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप मुद्रा प्रणाली विकसित हुई। व्याख्यान के दौरान मौर्य कालीन सिक्कों, उनकी निर्माण तकनीक, धातुओं के चयन, चिह्नों एवं प्रतीकों के महत्व तथा तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था में उनकी भूमिका पर विशेष बल दिया गया। साथ ही उस काल में प्रचलित लेन-देन की विनिमय प्रणाली और राज्य द्वारा मुद्रा नियंत्रण की व्यवस्था पर भी प्रकाश डाला गया।
 
प्रो. मणिन्द्र यादव ने व्याख्यान को सरल बनाते हुए प्रतिभागियों के समक्ष मुद्रा तकनीकि के इतिहास का पीपीटी के माध्यम से प्रदर्शित किया गया। उन्होंने प्रतिभागियों को प्राचीन सिक्कों से सम्बन्धित उदाहरण स्वरूप चित्र, आकृतियों को भी दिखाया। और प्रतिभागियों की मुद्राओं के प्रति जिज्ञासाओं को भी शान्त किया। 
 
कार्यशाला संयोजक के रूप में डॉ0 यशवन्त सिंह राठौर, उप निदेशक, राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर द्वारा सप्त दिवसीय कार्यशाला के द्वितीय दिन प्रतिभागियों को अवगत कराया गया कि अभिलेख एवं मुद्राओं के माध्यम से इतिहास लेखन अत्यन्त प्रमाणिक होता है। कार्यशाला में मुद्राओं की निर्माण तकनीकि एवं विकास के विभिन्न चरणों पर आज अत्यन्त रोचक जानकारी प्रतिभागियों को प्रदान की गयी। 
 
कार्यशाला के द्वितीय व्याख्यान श्रृंखला में लगभग 85 प्रतिभागियों सहित कार्यालय के कार्मिक भी उपस्थित रहें।  
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