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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 3 Feb 2026 6:56 PM |   192 views

उद्यान विज्ञान: कृषि आय का मजबूत आधार स्तंभ

आज की कृषि केवल अनाज उत्पादन तक सीमित नहीं रह सकती। बढ़ती जनसंख्या, घटती जोत, जल संकट, पोषण असुरक्षा और युवाओं के लिए रोजगार की आवश्यकता ने कृषि को नए रास्ते तलाशने के लिए विवश किया है। जिस प्रकार हरित क्रांति ने मुख्यतः धान और गेहूँ के बौने जीन आधार बना कर इन्ही दोनों फसलों के आधार पर भारत सँग पूरे विश्व में अपनी खेती का स्थान बनाया, अब दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश को ऐसे समय में उद्यान विज्ञान (Horticulture) एक ऐसा क्षेत्र बनकर उभरना है, जो आर्थिक रूप से लाभकारी, तकनीकी रूप से उन्नत और पर्यावरण के अनुकूल है जो वैश्विक रूप में अपने विभिनताओं से भरे माहौल में अनेकोनेक फसलें और उनके उत्पाद प्रसारित कर सके।
 
उद्यान विज्ञान फल, सब्ज़ी, फूल, मसाले, औषधीय एवं सुगंधित पौधों, चाय, कॉफी, नारियल जैसी फसलों के आधुनिक उत्पादन प्रणालियों को समाहित करता है, बल्कि इन सभी फसलों के उत्पाद संवर्धन पर भी कार्यरत है। यही कारण है कि इसे आज कृषि का सबसे गतिशील और संभावनाओं से भरपूर क्षेत्र माना जा रहा है।
 
उद्यान विज्ञान के सप्तरंगीय महत्व इस प्रकार हैँ:-
 
1. प्रति इकाई क्षेत्र अधिक उत्पादन और आय-
परंपरागत फसलों की तुलना में उद्यानिकी फसलें कम भूमि में कई गुना अधिक उत्पादन और आय देने में सक्षम हैं। जहाँ धान और गेहूँ से प्रति हेक्टेयर सीमित आय प्राप्त होती है, वहीं सब्ज़ी, फल, फूल और नर्सरी व्यवसाय से प्रति हेक्टेयर लाखों रुपये की आमदनी संभव है।
 
यह विशेषता छोटे और सीमांत किसानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिनके पास भूमि सीमित है लेकिन परिवार की आजीविका की जिम्मेदारी अधिक है। उद्यानिकी उन्हें आर्थिक आत्मनिर्भरता का अवसर देती है।
 
2. रोजगार और स्वरोजगार का सशक्त माध्यम-
उद्यान विज्ञान केवल उत्पादन नहीं, बल्कि रोजगार सृजन की पूरी श्रृंखला है। खेत से लेकर बाजार तक, प्रोसेसिंग से लेकर निर्यात तक, और नर्सरी से लेकर स्टार्टअप तक, हर स्तर पर कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता होती है।
पढ़ाई के स्तर पर B.Sc., M.Sc. और PhD के बाद
  •  सरकारी सेवाएँ,
  • निजी कंपनियाँ,
  • CSR परियोजनाएँ,
  • परामर्श सेवाएँ,
  • और स्वयं का उद्यम (नर्सरी, बागवानी, प्रोसेसिंग यूनिट, बिजनेस टू बिजनेस सप्लायर, खुदरा व्यापार) जैसे अनेक रास्ते खुलते हैं।
 
3.अंतरराष्ट्रीय बाजार और विदेशी मुद्रा अर्जन-
फल, सब्ज़ी, मसाले, फूल और उनके प्रोसेस्ड उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय मांग निरंतर बढ़ रही है। आम, केला, अंगूर, अनार, मसाले और कट फ्लावर जैसे उत्पाद भारत को वैश्विक बाजार में पहचान दिला रहे हैं।
 
कच्चे उत्पादों की तुलना में प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन से न केवल किसानों की आय बढ़ती है, बल्कि देश को विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती है। यही कारण है कि उद्यानिकी को निर्यात आधारित कृषि का आधार माना जा रहा है।
 
4. प्रोसेसिंग और उद्योगों से जुड़ाव-
 
उद्यानिकी उत्पाद आज अनेक कृषि एवं गैर-कृषि उद्योगों की मजबूत आधारशिला बन चुके हैं। फल एवं सब्ज़ियों का प्रोसेसिंग के माध्यम से जूस, पल्प, सॉस, प्यूरी, ड्राई उत्पाद और रेडी-टू-ईट सामग्री में रूपांतरण न केवल उत्पाद की शेल्फ-लाइफ बढ़ाता है, बल्कि किसानों को बेहतर मूल्य भी सुनिश्चित करता है। इसी प्रकार फूलों से प्राकृतिक रंग, गुलाल, इत्र, अगरबत्ती तथा अन्य सुगंधित उत्पादों का निर्माण ग्रामीण उद्योगों और लघु उद्यमों के लिए नई संभावनाएँ खोलता है।
 
उद्यानिकी अपशिष्टों का उपयोग कम्पोस्ट और जैव-उत्पादों के रूप में कर वेस्ट टू वेल्थ की अवधारणा को सफलतापूर्वक लागू किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ उत्पादन लागत में भी कमी आती है।
 
केला जैसे उद्यानिकी उत्पाद अब पारंपरिक उपयोग से आगे बढ़कर टेक्सटाइल, पैकेजिंग, फर्नीचर, फिशरीज फीडिंग और अन्य इको-फ्रेंडली उद्योगों में व्यापक रूप से प्रयुक्त हो रहे हैं। केले के फाइबर आधारित उत्पाद प्लास्टिक के विकल्प के रूप में तेजी से स्वीकार किए जा रहे हैं। उपभोक्ताओं का झुकाव टिकाऊ, जैव-आधारित और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों की ओर बढ़ रहा है, जिससे उद्यान विज्ञान और औद्योगिक विकास के बीच संबंध और भी सुदृढ़ होता जा रहा है।
 
5. पशुपालन और उद्यानिकी का समन्वय-
उद्यानिकी फसलें पशुओं को हरा चारा, फल-सब्ज़ी अवशेष और पोषण-समृद्ध जैव पदार्थ उपलब्ध कराती हैं, जिससे पशु स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता में सुधार होता है। यदि किसी मौसम में फसल प्रभावित होती है, तो पशुपालन आय को संतुलित करता है। यह समन्वय किसानों के लिए आर्थिक जोखिम को कम करने का प्रभावी माध्यम है। पशुओं से प्राप्त गोबर और मूत्र का उपयोग कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और जैव-उर्वरकों के रूप में उद्यानिकी फसलों में किया जाता है। वहीं फल-सब्ज़ी और फूलों के अवशेष पशु आहार के रूप में उपयोग होकर अपशिष्ट को मूल्य में परिवर्तित करते हैं। यह मॉडल वेस्ट टू वेल्थ का उत्कृष्ट उदाहरण है।
 
उद्यानिकी फसलों, विशेषकर गेंदे की पंखुड़ियों और हरी पत्तेदार सब्ज़ियों का उपयोग पोल्ट्री आहार में करने से अंडों की जर्दी का रंग गहरा पीला या लाल होता है, जिसे उपभोक्ता अधिक पसंद करते हैं। परिणामस्वरूप ऐसे अंडों का बाज़ार मूल्य सामान्य अंडों की तुलना में अधिक प्राप्त होता है। यह उदाहरण दर्शाता है कि कैसे उद्यानिकी पशुपालन उत्पादों के मूल्य संवर्धन में योगदान देती है।
 
पशुपालन और उद्यानिकी का समन्वय केवल एक उत्पादन प्रणाली नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता, पोषण सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन का व्यावहारिक समाधान है। बदलते कृषि परिदृश्य में यह मॉडल किसानों को जोखिम से सुरक्षा, नियमित आय और दीर्घकालिक टिकाऊ विकास का मार्ग प्रदान करता है। समेकित कृषि प्रणाली के बिना टिकाऊ कृषि की कल्पना अधूरी है, और इसमें पशुपालन व उद्यानिकी की भूमिका केंद्रीय है।
 
6. ऑफ-सीजन उत्पादन और संरक्षित खेती-
ग्रीनहाउस, शेड नेट, मिस्ट चेंबर और नर्सरी जैसी तकनीकों ने ऑफ-सीजन उत्पादन को आसान और लाभकारी बना दिया है।ग्रीनहाउस, शेड नेट, मिस्ट चेंबर और आधुनिक नर्सरी जैसी संरक्षित खेती की तकनीकों ने उद्यानिकी में ऑफ-सीजन उत्पादन को सरल, नियंत्रित और आर्थिक रूप से लाभकारी बना दिया है। इन तकनीकों के माध्यम से तापमान, आर्द्रता, प्रकाश और पोषण का संतुलन स्थापित कर वर्ष भर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन संभव होता है।
 
संरक्षित खेती से उत्पादन में निरंतरता बनी रहती है, जिससे किसानों को बाजार में अचानक उतार-चढ़ाव का सामना नहीं करना पड़ता। ऑफ-सीजन में उत्पाद उपलब्ध होने के कारण बेहतर मूल्य प्राप्त होता है, जिससे आय में स्थिरता आती है। साथ ही सूक्ष्म सिंचाई, मल्चिंग और नियंत्रित वातावरण के कारण जल एवं अन्य संसाधनों की दक्षता बढ़ती है, जो वर्तमान जल संकट की स्थिति में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे
  •  उत्पादन स्थिर रहता है|
  • बाजार में बेहतर दाम मिलते हैं|
  • जल व संसाधनों की बचत होती है।
7.नए युग की खेती: उद्यान विज्ञान की देन-
टिशू कल्चर, हाइड्रोपोनिक्स (बिना मिट्टी), एरोपोनिक्स और वर्टिकल फार्मिंग जैसे नए उद्योग केवल उद्यान विज्ञान की नींव पर ही संभव हैं। Pतकनीकें कम पानी, कम भूमि, और उच्च गुणवत्ता उत्पादन का मार्ग प्रशस्त करती हैं, विशेषकर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में।
 
उद्यान विज्ञान ने कृषि को केवल भूमि आधारित गतिविधि से आगे बढ़ाकर उच्च तकनीक और ज्ञान आधारित उद्योग के रूप में स्थापित किया है। टिशू कल्चर तकनीक के माध्यम से रोग-मुक्त, समान गुणों वाली और बड़े पैमाने पर पौध उत्पादन संभव हुआ है, जिससे व्यावसायिक बागवानी और नर्सरी उद्योग को नई दिशा मिली है।
 
हाइड्रोपोनिक्स (बिना मिट्टी), एरोपोनिक्स और वर्टिकल फार्मिंग जैसी उन्नत प्रणालियाँ कम पानी और सीमित भूमि में उच्च गुणवत्ता उत्पादन का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करती हैं। ये तकनीकें विशेष रूप से शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ताज़ी, सुरक्षित और पोषण-समृद्ध सब्ज़ियों की आपूर्ति के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही हैं।
 
अन्त में——-
घटती कृषि जोत, जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव, जलवायु परिवर्तन की चुनौती और उपभोक्ताओं की बदलती खाद्य आदतों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पारंपरिक उत्पादन प्रणालियाँ अकेले इन समस्याओं का समाधान नहीं कर सकतीं। ऐसे समय में उद्यानिकी, पशुपालन और संरक्षित खेती का समन्वय आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक संतुलन स्थापित करता है।
 
आधुनिक तकनीकों ने किसानों को मौसम और बाजार दोनों पर नियंत्रण की क्षमता दी है। इससे उत्पादन की निरंतरता, बेहतर मूल्य प्राप्ति और संसाधनों की दक्षता सुनिश्चित होती है। वहीं टिशू कल्चर, हाइड्रोपोनिक्स, एरोपोनिक्स और वर्टिकल फार्मिंग जैसी उन्नत तकनीकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि खेती अब केवल भूमि पर निर्भर गतिविधि नहीं रही, बल्कि यह ज्ञान, तकनीक और नवाचार आधारित उद्योग बन चुकी है।
 
भविष्य की कृषि वही होगी जो कम संसाधनों में अधिक मूल्य, कम जोखिम में स्थिर आय और पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित कर सके। उद्यान विज्ञान इन सभी कसौटियों पर खरा उतरता है। अतः यह कहना उपयुक्त होगा कि उद्यान विज्ञान न केवल कृषि का भविष्य है, बल्कि आज की सबसे व्यावहारिक और आवश्यक दिशा भी है।
 
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि “उद्यान विज्ञान कृषि का भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता बन चुका है।
 
डॉ. शुभम कुमार कुलश्रेष्ठ ,विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापक – उद्यान विभाग, (कृषि संकाय)
रविन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, रायसेन, मध्य प्रदेश
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