उ0प्र0 हिन्दी संस्थान द्वारा हजारी प्रसाद द्विवेदी, अमृतलाल नागर एवं भगवतीचरण वर्मा स्मृति समारोह का आयोजन
लखनऊ: -उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा हजारी प्रसाद द्विवेदी, अमृतलाल नागर एवं भगवतीचरण वर्मा के स्मृति समारोह के शुभ अवसर पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन आज हिन्दी भवन के निराला सभागार लखनऊ में किया गया। दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा एवं हजारी प्रसाद द्विवेदी, अमृतलाल नागर एवं भगवती चरण वर्मा के चित्र पर माल्यार्पण, पुष्पार्पण के उपरान्त वाणी वंदना सुश्री रत्ना शुक्ला द्वारा प्रस्तुत की गयी।
सम्माननीय अतिथि-पद्मश्री डॉ0 विद्याबिन्दु सिंह, पद्मकान्त शर्मा ‘प्रभात‘, चन्द्रशेखर वर्मा का स्वागत डॉ0 अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा किया गया। इस अवसर पर श्री चन्द्रशेखर वर्मा ने कहा कि भगवती चरण वर्मा की साहित्यिक यात्रा कवि के रूप में शुरू हुई।
वह व्यक्ति को बात करने से पहले 30-40 सेकेण्ड तक पढ़ते थे, तद्ोपरान्त बातचीत का सिलसिला शुरू होता था। वर्मा जी की कृतियों में मानवीय संवेदनाओं का बिम्ब-प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है। फिल्म जगत के अभिनेता दिलीप कुमार का नाम भगवती चरण वर्मा जी ने ही रखा था। वर्मा जी के कथा संसार को पढ़ते हुये पाठक के चेहरे पर भाव स्वतः ही नजर आने लगते हैं, भगवती चरण वर्मा का चित्रलेखा उपन्यास अद्वितीय उपन्यास है, जो जीवन दर्शन को रेखांकित करता है।
पद्मकान्त शर्मा ‘प्रभात‘ ने कहा कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य, हिन्दी संस्कृत और बंगला भाषाओं के उन्नायक थे। भारतीय संस्कृति और सामाजिक चेतना के अग्रदूत के रूप में याद किये जायंेगे। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के प्रथम उपाध्यक्ष थे और उपाध्यक्ष के समय के उनके संस्मरण और उनकी कविताओं का पाठ किया।
पद्मश्री डॉ0 विद्याविन्दु सिंह ने कहा कि अमृतलाल नागर जी की 108 वीं जयन्ती के अवसर पर नागर जी के विशाल साहित्य का स्मरण किया। उनकी कृति ‘सुहाग के नुपुर‘ सांराश के माध्यम से भारतीय नारी के सुहाग चिह्न की उपयोगिता भी बताई।
उन्होंने भारत में साइमन कमीशन के आगमन पर उनके द्वारा लिखी गई कविता की चर्चा करते हुए कहा कि नागर जी का नाम विशेष सर्जकों में हैं, जिन्होंने साहित्य की विरासत को आगे बढ़ाया और साहित्य से होते हुए वे रेडियों की दुनिया में भी आए। नागर जी लखनऊ के इतिहास के कुछ पन्नों पर अपनी लेखनी चलाई। तमिल महाकाव्य सिलप्पदिकारम् के आधार पर लिखा। उनका उपन्यास ‘सुहाग के नूपुर‘ पर चर्चा करते हुए। ’सुहाग के नूपुर’ को नागर जी की उत्कृष्ट कृति बताया।
