सितम्बर माह में धान की फसल में कीट/ रोग का रखें विशेष ध्यान
माह सितंबर के इस समय में धान की फसल बालियां निकलने या दाने भरने की अवस्था में होती है। इस दौरान उच्च नमी, उमस और तापमान के कारण प्रमुख कीटों और रोगों का खतरा सबसे अधिक रहता है। समय रहते कीटों की पहचान कर प्रबंधन करना आवश्यक होता है। प्रसार्ड ट्रस्ट मल्हनी भाटपार रानी देवरिया के अध्यक्ष प्रो. रवि प्रकाश मौर्य ने बताया कि तना छेदक कीट की सुंडी तने के अंदर घुसकर पौधे को खाती है, जिससे बीच की गोभ पीली पड़कर सूख जाती है तथा बालियाँ सफेद निकलती है ।इसके प्रबंधन हेतु 5 फेरोमोन ट्रैप (प्रलोभक फंदा) प्रति हेक्टेयर की दर से लगायें।परजीवी ट्राइकोग्रामा जापोनिकम का 1.5 लाख अड़े प्रति हे. की दर से निगरानी के आधार पर प्रयोग करें । एजाडिरेक्टिन 0.15 प्रतिशत ई. सी. 2.5 लीटर या कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 50 % एस. पी. 2 किग्रा. को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर में छिकाड़काव करें।
धान में लगने वाला फुदका कीट तीन तरह का होता है।
भूरा फुदका कीट पौधों के निचले हिस्से का रस चूसता है, जिससे फसल गोल घेरे में सूखने लगती है जिसे ‘हॉपर बर्न’ कहते हैं।
हरा फुदका कीट के शिशु तथा प्रौढ दोनों ही पत्तियों का रस चूसते है जिससे ग्रसित पत्तियाँ पहले पीले व बाद में कत्थई रंग की होकर नोंक से नीचे की तरफ सूखने लगती है।
सफेद पीठ वाला फुदका कीट के शिशु एवं प्रौढ दोनों ही पत्तियों एवं किल्लों के मध्य रस चूसते है जिससे पौधे पीले पड़कर सूख जाते है। सभी तीनों तरह के फुदका कीटों के प्रबंधन के लिए 10 दिनों की अंतराल पर अतरिक्त पानी निकाल कर अथवा सिंचाई रोक कर खेत को 2-3 दिन के लिए सुखाए। प्रकोप की स्थिति में यूरिया का प्रयोग न करें। अजेडीरेक्टीन 0.15 प्रतिशत ई. सी. 2.5 लीटर या पायमेट्रोजिन 50 डब्बू. पी.300 ग्राम या डाइनोटफ्यूरान 20 % एस. जी 150-200 ग्राम को 600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर में छिड़काव करें। खेत में हवा का आवागमन रखें और पानी भर कर न रखें।
धान में बालियाँ निकलते समय गंधी बग कीट का प्रकोप होता है।इस कीट के शिशु एवं प्रौढ् लम्बी टागों वाले भूरे रंग के विशेष गंध वाले होते है जो दूधिया अवस्था में बालियों से रस चूसता है, जिससे दाने खाली या काले रह जाते हैं।
गंधी बग के प्रबंधन के लिए अजेडीरेक्टीन 0.15 प्रतिशत ई. सी. 2.5 लीटर को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर में छिड़काव करें। या सुबह / शाम के समय मैलाथियान 5 प्रतिशत 20- 25 किग्रा. का धूल का बुरकाव करें।
इस समय धान मे झोंका / ब्लास्ट रोग लगने की संम्भावना रहती है, पत्तियों पर आंख के आकार के भूरे-नीले रंग के धब्बे बनते हैं पत्तियों के अतिरिक्त बालियों, डण्ठलों पुष्प शाखाओं एवं गाठों काले भूरे धब्बे बनते है।और गर्दन टूटने से बालियां सूख जाती हैं। इसका प्रकोप सुगंधित धान में ज्यादा होता है।
रोग के प्रकोप की स्थिति में यूरिया का प्रयोग न करें। कल्ले एवं बाली निकलते समय खेत में नमी बनाये रखें ।हेक्साकोनाजोल 5%% ई. सी. 1 लीटर या टेबुकोनाजाल 25% डब्लू. जी 500 ग्राम 600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर में छिड़काव करें।
शीथ ब्लाइट रोग में पौधे के निचले हिस्से पर पानी जैसे अनियमित आकार के धब्बे बनते हैं जिसके किनारा गहरा भूरा तथा मध्य भाग हल्के रंग का होता हैं।
इसके प्रबंधन हेतु नाइट्रोजन उर्वरक (यूरिया) का अत्यधिक प्रयोग न करें। हेक्साकोनाजोल 5% ई. सी. 1 लीटर या प्रोपिकोनाजोल25% ई. सी. 500 मिली को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
जीवाणु झुलसा रोग में पत्तियाँ नोक अथवा किनारे से एकदम सूखने लगती हैं सूखे हुए किनारे अनियमित एवं टेढे. मेढे. हो जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 15 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट 90%+ टेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लोराइड 10% को 500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 % डब्लू. पी. के साथ मिलाकर प्रति हेक्टेयर 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
धान में बालियां निकलने पर मिध्या कण्डुआ रोग का प्रकोप होता है।इस रोग में बालियों के कुछ दाने पीले रंग के पाउडर में बदल जाते है। जो बाद में काले रंग के हो जाते है।संक्रमित पौधों को उखाड़ कर कागज या अखबार में लपेटकर खेत के बाहर जला दें। कार्बेन्डाजिम 50% डब्लू. पी. 500ग्राम या कापर हाइड्राक्लासाइड 77% डब्लू. पी. 2 किग्रा. को 600 ली पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर में
छिड.काव करें।
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