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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 24 Jan 2026 7:19 PM |   221 views

CSR परियोजनाओं से बंजर भूमि का पुनर्जीवन और टिकाऊ कृषि की संभावनाएँ

भारत के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में बंजर और क्षरित भूमि एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसी भूमि न केवल कृषि उत्पादन को सीमित करती है, बल्कि ग्रामीण आजीविका, रोजगार और पर्यावरणीय संतुलन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। इस संदर्भ में कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (CSR) के अंतर्गत नियोजित और वैज्ञानिक कृषि हस्तक्षेप बंजर भूमि को पुनः उत्पादक बनाने की बड़ी संभावना प्रदान करते हैं।
 
वैज्ञानिक मूल्यांकन से शुरुआत-
किसी भी भूमि पुनर्स्थापन कार्यक्रम की सफलता का आधार मिट्टी की स्थिति, जल उपलब्धता और स्थानीय जलवायु का वैज्ञानिक आकलन है। वर्षा आधारित और सीमांत क्षेत्रों में जल धारण क्षमता, मिट्टी की गहराई और पोषक तत्वों की उपलब्धता को समझे बिना हस्तक्षेप करना दीर्घकालीन रूप से प्रभावी नहीं होता। इस मूल्यांकन के आधार पर तनाव सहनशील फसलों, देशी प्रजातियों और कम इनपुट वाली कृषि प्रणालियों का चयन किया जा सकता है।
 
फसल और प्रजाति चयन की भूमिका-
बंजर और वर्षा आधारित क्षेत्रों में मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी), दलहन (अरहर, मूंग, लोबिया), चारा फसलें, कठोर उद्यानिकी फसलें तथा औषधीय और बहुवर्षीय पौधों का चयन भूमि उत्पादकता बढ़ाने में सहायक होता है। ये फसलें कम पानी और कम लागत में बेहतर उत्पादन देती हैं तथा जलवायु और बाजार जोखिम को भी कम करती हैं।
 
पायलट मॉडल और विविधीकरण-
CSR परियोजनाओं में पायलट स्तर पर विविध कृषि मॉडलों का परीक्षण एक आवश्यक चरण है। अंतरफसली खेती, कृषि वानिकी, चारा विकास, औषधीय पौधारोपण और सहनशील उद्यानिकी फसलों के माध्यम से विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन किया जा सकता है। इन पायलट मॉडलों से प्राप्त आंकड़े फसल चयन, इनपुट प्रबंधन और आर्थिक व्यवहार्यता को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।
 
ग्राम स्तर पर विस्तार और सहभागिता-
सफल पायलट मॉडलों को किसान प्रशिक्षण, सामुदायिक भागीदारी और CSR तथा सरकारी योजनाओं के समन्वय से ग्राम स्तर पर विस्तार दिया जा सकता है। जब स्थानीय किसान और संस्थाएँ योजना निर्माण और क्रियान्वयन में भागीदार बनती हैं, तब परियोजनाएँ केवल परिसंपत्ति निर्माण तक सीमित न रहकर आजीविका आधारित पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तित हो जाती हैं।
 
खेती से आगे रोजगार की संभावनाएँ-
CSR आधारित कृषि कार्यक्रम केवल उत्पादन तक सीमित नहीं होते। कृषि वानिकी, सामुदायिक नर्सरी, प्राकृतिक और जैविक खेती, तथा मूल्य श्रृंखला विकास के माध्यम से वर्ष भर रोजगार के अवसर सृजित किए जा सकते हैं। नर्सरी प्रबंधन, पौधारोपण, रखरखाव, कटाई, प्राथमिक प्रसंस्करण और विपणन जैसी गतिविधियाँ ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए विशेष अवसर प्रदान करती हैं।
 
दीर्घकालीन ग्रामीण परिवर्तन की दिशा-
 
सुनियोजित पायलट परियोजनाएँ किसानों का जोखिम कम करती हैं, आत्मविश्वास बढ़ाती हैं और दीर्घकालीन ग्रामीण परिवर्तन का व्यावहारिक रोडमैप प्रस्तुत करती हैं। जब विज्ञान, स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक सहभागिता एक साथ कार्य करती है, तब बंजर भूमि को उत्पादक बनाना केवल संभव ही नहीं, बल्कि टिकाऊ भी बनता है।
 
उचित तकनीकी मार्गदर्शन और दीर्घकालीन दृष्टिकोण के साथ CSR पहलें केवल पौधारोपण लक्ष्यों से आगे बढ़कर आत्मनिर्भर, जलवायु-सहिष्णु और आजीविका समर्थ ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण कर सकती हैं।
 
डॉ. शुभम कुमार कुलश्रेष्ठ-विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापक – उद्यान विभाग
(कृषि संकाय),रविन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, रायसेन, मध्य प्रदेश
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