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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 16 Jan 12:42 PM

दहेज किसे कहते हैं

मकर संक्रांति के दिन सुबह स्नान दान के बाद सोचा कि”अपने सभी दोस्तों को मोबाइल से बधाई न देकर घर- घर जाकर बधाई दूं। सभी दोस्त अगर एक- एक तिलवा और एक एक कटोरी दही चूड़ा खिला देंगे तो मेरा पेट भर जाएगा और मेरे घर का सारा सामान बच जाएगा जो दूसरे दिन मेरे काम आएगा।
 
सबसे पहले मैं अपने एक हास्य कवि मित्र के घर की ओर चला जिनका उपनाम है– उल्लू बसंत। अभी मैं कुछ ही दूर गया था कि तब तक मेरी पत्नी का काल आ गया। हलो कहते ही पत्नी ने कहा कि “दरवाजे पर उल्लू बसंत करीब छः सात लोगों के साथ खड़े हैं तुरंत आ जाओ।
 
“मेरी योजना पर तो पानी फिर गया तुरंत वापस आ कर पीछे के दरवाजे से घर के अंदर गया और ड्राइंग रूम में जाकर दरवाजा खोलने वाला था कि उल्लू बसंत की आवाज सुनाई पड़ी “आज हम सात लोगों को मकर संक्रांति यहीं मनानी है।दिन में दही चूड़ा, तिलवा, तिलकुट,गजक आदि और रात में खिचड़ी भी यहीं खा कर अपने अपने घर जाएंगे।” इतना सुनते ही मेरे दोनों कान खड़े हो गए।गला दबा कर लड़की की आवाज़ में बोला कि “घर पर कोई नहीं है।सब लोग खिचड़ी मनाने अपने गांव ग‌ए हैं।
 
        “तुम कौन हो?”
        “मैं उनकी दाई हूं।”
        “दरवाजा तो खोलो।
 
नहीं, मैं लड़की हूं, अकेली हूं।डर लगता है। दरवाजा नहीं खोलूंगी।साहब आएंगे तो आप का नाम बता दूंगी।” इतना सुनते ही उल्लू बसंत मेरे लिए उल्टा सीधा बड़बड़ाते हुए अपने दोस्तों से कहा कि चलो यार कहीं और चलते हैं। लेकिन रात की खिचड़ी खाने के बाद ही घर जाएंगे।
 
मैंने भी सुनहरा अवसर देखकर उल्लू बसंत के घर पहुंच गया सोचा कि यह नहीं है तो क्या हुआ भाभी जी तो हैं न ,जम कर दही चूड़ा खाऊंगा। दरवाजे पर दस्तक दिया तो भाभी जी बाहर निकल कर बोलीं कि “आप के दोस्त तो नहीं है कहीं ग‌ए हुए हैं।
 
“कोई बात नहीं भाभी जी,आप बधाई स्वीकार कीजिए।”
“कैसी बधाई?”
“आज मकर संक्रांति है न, आज से सूर्य उत्तरायण हो जाएंगे।”
“लेकिन हम लोगों का सूर्य तो सदा दक्षिणायन ही रह रहे हैं।”
“ऐसा क्या हो गया है भाभी जी?
 
“मुझे एक ही तो लड़का है, प्राइवेट लिमिटेड में काम करता है।उसकी शादी नहीं हो पा रही है। मकर संक्रांति के विवाह का मुहूर्त खुल जाता है लेकिन हम लोगों के लिए नहीं।
 
“आखिर क्यों?
 
जो भी आता है तो न कम्पनी पूछता है और न उसका वेतन,सबका पहला सवाल होता है कि ऊपरी आमदनी कितनी है? जब मैं कहती हूं कि प्राइवेट नौकरी में ऊपरी आमदनी नहीं होती तो चले जाते हैं और फिर लौटकर नहीं आते हैं।
 
इसीलिए न हमारे प्रधानमंत्री जी सब कुछ प्राइवेट करना चाहते हैं ताकि ऊपरी आमदनी का लफड़ा समाप्त हो जाए।
 
 हां,वह तो ठीक है लेकिन सभी विभागों का निजीकरण होते-होते मेरा बेटा तो बूढ़ा हो जाएगा न , तो क्या उसकी शादी तब किसी बुढ़िया से होगी?
 
“नहीं भाभी जी, ऐसा न कहें,उसकी शादी मैं कराऊंगा। बोलिए आप कैसी शादी चाहती हैं?
 
कैसी क्या,मेरा बेटा बहुत सुंदर है इसलिए लड़की तो इन्द्र की परी जैसी चाहिए और तिलक दहेज से तो मुझे सख्त नफरत है इसलिए तिलक दहेज के नाम पर कुछ नहीं चाहिए। लेकिन आज कल लड़की वाला तो विवाह का दोनों तरफ का सारा खर्च अपने ऊपर ले ही लेता है।तो मेरे तरफ का खर्च कोई ज्यादा नहीं है महज पचीस लाख है और इसके अलावा लड़की वाला तो अपने बेटी-दामाद को बिना मांगे ही टीवी,फ्रीज,ए०सी०कूलर , वाशिंग मशीन,फोर ह्वीलर,फोर रूम फ्लैट, गीज़र इत्यादि तो देता ही है। हां मुझको कुछ नहीं चाहिए। मेरे बेटे की शादी करा देंगे तो आप का बहुत बड़ा उपकार होगा मेरे ऊपर।”इतनी बातें सुनते हुए मेरा मुंह खुला का खुला रह गया आंखें फटी की फटी रह गईं।
 
फिर मैंने अपनी हिम्मत सम्हालते हुए कहा कि” तो भाभी जी, फिर दहेज किसे कहते हैं? अब आप गुड़िया और बुढ़िया की बात तो भूल जाइए,अब आप के लड़के को ज़हर की पुड़िया भी नहीं मिलेगी।” इतना कह कर मैं अपने घर आ गया और अपने घर का ही दही चूड़ा तिलवा खाया। – भोला प्रसाद आग्नेय 
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