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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 2 Jan 2021 4:05 PM |   2052 views

नव वर्ष : जिजीविषा एवं लालित्य का समास

नववर्ष केवल नये समय का पर्व नहीं। वह जिजीविषा, सामूहिकता, वैभव, समृद्धि की कामना, संकल्प, नूतनता के उन्मेष का भी प्रकटीकरण है। विषाद की छाया के विरुद्ध नवता का उद् घोष। वास्तव में विगत समय व वर्ष हमसे हमारा आकलन चाहता है। नया वर्ष उजाले के बिंब की रुपहली मछली की तरह हमारे मन की संरचना में छलक उठता है। नववर्ष का पक्ष आवश्यक रूप से विगत वर्ष का अगला चरण है। यह खट्टा, मीठा, तीखा, कई स्वादों से संपृक्त है। नये वर्ष व विगत वर्ष का संधि बिंदु हमें कई बार एकांत मनन की सुविधा देता है। नववर्ष हमें भविष्य के दृश्य से परिचित कराने की ओर ले जाता है। हमारी दृष्टि में संसार युग्मों से सृजित है : परंपरा व आधुनिकता, स्थिर व जंगम इत्यादि।नये समय का अर्थ आत्मा के रंग में नये सृजन के संकल्प के रूप में जुड़ा है। प्रभु वर्ग चाहे जितना तामझाम कर ले, सामान्य व्यक्ति अपने आगे को निर्धारित करने के लिएअधिक संवेदनशील होता है, इस संधि-बिंदु पर। यह अलग बात है कि व्यवस्था की शीत ऋतु में परिवर्तन की ऊष्मा की प्रेरणा सामान्य आदमी को मिल ही जाती है। दु:ख, विषाद, पैसे की कमी, रोजगार का वज्र संकट : इसके बावजूद यदि नववर्ष परंपरा से हमें नये दुष्चक्रों को भेदने के लिए आलोकित करता है, ऊष्मा देता है, तो यही उसकी महिमा है। काल अनंत है और प्रवहमान भी। उसके किसी खंड में हम जीते हैं। हमारी स्मृतियां और आकांक्षाएं समय सापेक्ष हैं, और समय को अतिक्रमित करने वाली भी। जो आकांक्षाएं सावधि होती हैं, उनकी अपनी सीमाएं हैं। मनुष्य है कि सीमाएं तोड़ता है। वह ससीम से असीम की ओर बढ़ता है। यही उसके व्यक्तित्व का घनत्व है। वह व्यष्टि  से समष्टि की ओर बढ़ता है। वह निजता के साथ-साथ पंक्तिबद्ध  होता है। आज विश्व के अनेक परिवर्तन पंक्तिबद्धता और समूहवाची होने के परिणाम हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्तित्व की आंतरिकता के महत्त्व कम हुए हैं। सच तो यह है कि बढ़ते शोरगुल और आक्रामक माहौल में निजता की प्रतिष्ठा की अर्थवत्ता और बढ़ी है।
 
नववर्ष में परिवर्तन की कामना के साथ व्यक्तित्व की निजता को एक साथ संबल मिलना अभीष्ट है। आज व्यक्तित्व ही विलोपित हो रहा है। व्यक्तित्वहीन व्यक्तित्व। साहित्य, कलाएं, नवाचार, आंदोलन आदि व्यक्तित्वहीनता के इसी आवरण को उतारते हैं :मूर्त या अमूर्त रूप में। नववर्ष साल भर की प्रतीक्षा के बाद आता है। यह धीरज स्मृतियों में संपुंजित होता है। विगत का हर क्षण गंध और रोशनी की तरह या कभी-कभी अंधकार की तरह हमारे मन में अस्तित्व के हिस्से रूप में लगते हैं। जो बेहतर होता है, वह उजास की तरह होता है। उजास की दृष्टि हमारे अनुभव में मिल जाती है तथा समकालीनता का दृश्यांकन करती है। हमारे लोक समाजों में भूत-भविष्य का लेखा-जोखा एक आवेग जैसा है, जिसमें अनगढ़ता और आदिम ऊष्मा है। हम अपने ज्योति-पुंज के रूप के रूप में नववर्ष को लेते हैं, जो हमें आलोकित कर दे। प्रस्तुत वर्ष परिवर्तन का वर्ष है। प्रत्येक क्षण वैसे तो बदलाव ही लाता है, लेकिन यहां ‘‘परिवर्तन’का बृहत् अर्थ है। यहां अर्थ है : मानवीय सरोकारों का दृष्टिबोध बदलना,  सड़े-गले पक्षों पर प्रहार, नस्ल, वर्ण, पंथ, भाषा, क्षेत्रके अतिवाद से मुक्ति। यह नहीं चलेगा कि एक टेंट में रोज बच्चे मर रहे हैं, और दूसरी ओर स्तरहीन सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर नजरें मटकाई जा रही हैं। अब यह देखना होगा कि कृति का कौन सा विखंडन या विश्लेषण अथवा उपपाठों की तलाश राजनैतिक तौर पर सही या गैर-सही है।
 
नई सांस्कृतिक चेतना से नववर्ष का प्रारंभ ही अभीष्ट है। यह देश में नई व्यवस्थागत बहस, बदलाव लाए-यह कामना है। डिबेट और डिस्कोर्स हो न कि डिनाउंसिंग और डिबंकिंग क्योंकि इससे संवाद की स्थिति समाप्त हो जाती है। वर्तमान समय संवाद बढ़ाने का है न कि अलगीकृत हो जाने का। यद्यपि सूचना के महाअंबार में अलग होते जाते व्यक्तित्वों व समाजों का प्राधान्य बढ़ रहा है। आज ईमानदारी और सादगी की आवश्यकता है, लेकिन इसकी पैकेजिंग हो रही है। इसे राजनीति में ‘‘इस्तेमाल’ किया जा रहा है। ‘‘इस्तेमाल होने’ व ‘‘जीने’ में फर्क को नववर्ष का आधार बनाना जरूरी है। ‘‘होने’ व ‘‘प्रचारित’ करने के बीच की क्षीण रेखा को देखें। व्यक्ति के अभ्यंतर व समूह के संघर्ष से नववर्ष को नई आभा के रूप में बदल सकते हैं। इसे संकल्प के अवसर, प्रसन्नता, एकजुटता, समानता, परिवर्तन, नवाचार के प्रतीक के रूप में ले सकते हैं। केवल कैलेंडर की तारीख बदलना नववर्ष नहीं। केवल बारह महीने बीत जाना वर्ष की विदाई नहीं। इसके लिए अंतर्दृष्टि और कालपथ पर पदचाप दर्ज करना आवश्यक है। नईसंभावना, नई दृष्टि, संघर्ष और लालित्य का प्रवेश ही नववर्ष है। 
 
वर्तमान समय संवाद बढ़ाने का है न कि अलगीकृत हो जाने का। यद्यपि सूचना के महाअंबार में अलग होते जाते व्यक्तित्वों व समाजों का प्राधान्य बढ़ रहा है। आज ईमानदारी और सादगी की आवश्यकता है, लेकिन इसकी पैकेजिंग हो रही है। इसे राजनीति में ‘‘इस्तेमाल’ किया जा रहा है। ‘‘इस्तेमाल होने’ व ‘‘जीने’ में फर्क को नववर्ष का आधार बनाना जरूरी है। ‘‘होने’ व ‘‘प्रचारित’ करने के बीच की क्षीण रेखा को देखें। व्यक्ति के अभ्यंतर व समूह के संघर्ष से नववर्ष को नई आभा के रूप में बदल सकते हैं। इसे संकल्प के अवसर, प्रसन्नता, एकजुटता, समानता, परिवर्तन, नवाचार के प्रतीक के रूप में ले सकते हैं। केवल कैलेंडर की तारीख बदलना नववर्ष नहीं। केवल बारह महीने बीत जाना वर्ष की विदाई नहीं। इसके लिए अंतर्दृष्टि और कालपथ पर पदचाप दर्ज करना आवश्यक है। नईसंभावना, नई दृष्टि, संघर्ष और लालित्य का प्रवेश ही नववर्ष है।
  
नया वर्ष अन्तहीनता को एक ठौर देता है। हमारी स्मृति, आशा , लगाव , भविष्यकामिता के आलोड़न के विविध स्पंदन नए वर्ष के आधारबिन्दु हैं। भाषा की एक ऐसी ग्राफिक्स रचता है नया वर्ष , जिसमें सामान्य मनुष्य है, किसान है, आखिरी आदमी है। वहाँ तक हमारे समय की सुनहरी किरण  जानी चाहिए। जहाँ ज़िदगी से हारता आदमी समग्रता से जीवन को आलोकित कर सके, जहाँ अंधकार से घिरा समाज अपने लिए रोशनी तलाश सके, सच पूछिये तो वहीं नव वर्ष की असली सार्थकता है !
 
( परिचय दास )
प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, 
नव नालंदा महाविहार 
सम विश्वविद्यालय (संस्कृति मंत्रालय , भारत सरकार ), नालंदा 
 
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