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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 30 May 2020 11:33 AM |   635 views

सावन सा जीवन

एक सावन की तलाश है, एक सावन का अभ्यास है। 
एक सावन से संसार है, एक सावन के आने का इंतज़ार है।
मैं खुद में एक तूफान बटोरे,एक सावन से लड़ रहा हूँ।
एक सावन सा जीवन मैं,आँखों में क्यों भर रहा हूँ?
कभी बरस पड़ता हूँ,कभी तरस जाता हूँ।
कभी एक सावन के लिए रोज़- रोज़ मरता हूँ।
 
अंजान हूँ इस बात से,कि क्या होता सावन है?
एक तूफान बटोरे मासूमियत से कह देता हूँ। 
ये सावन क्या होता है,ये सावन क्या होता है?
इतने में ही गरज पड़ा एक बादल मुझ पर,
और बोला कि सावन-सावन करते हो तुम,
रवि हो या कवि हो? तुम दाता हो या विधाता?
 
सावन को समाने की बात करते हो,
अभी सावन तुमने देखा कहाँ है?
तू क्षण में नैनों चार-चार आंसू भर के रोता है,
और सावन उसको कहता है। 
सावन का दर्द अभी तूने देखा कहाँ है?
तू रोकर हँसता है और फिर शांत हो जाता है,
वो अपनी पीड़ा किसे सुनाये,उसे कौन चुप कराये?
उसे मालूम है कि उसके आंसू किसी का जीवन है,
तो वह रोता है और रोता है,और उसके आने पर तू हँस देता है।
 
तेरे कर्मों का साक्षी हूँ मैं, मुझे दलील मत देना,
अब दुबारा आंसू भरी झील मत देना।
एहसास करना सावन के दर्दों का,
फिर उसके ग़मों को आंसू की झील मत देना।
उसके आते ही खिलखिला लेना और मुस्कुरा देना,
उसके दर्दों को और दर्द मत देना।
जिस सावन की तलाश थी वो आज मेरे साथ है।
जिस सावन का अभ्यास था वो तो कर्मों का आसमान है।
जिस सावन से संसार था वो तो दर्द में मुस्कान है।
और जिसके आने का इंतज़ार था,वो तो कभी आया ही नहीं।
 
मैं खुद में बूंदें बटोरे, नदियों में बह रहा हूँ।
एक लहर से जीवन में मैं, खुशी-खुशी बह रहा हूँ।
कभी हँस पड़ता हूँ, कभी होश खो देता हूँ,
कभी सावन की याद आये तो हँस के रो देता हूँ।
 
(आयुषी श्रीवास्तव “लहर” लखनऊ ) 
 
 
 
 
 
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