उपभोक्ता कितना जागरूक है
बरसात की शाम है। बाहर मिट्टी की खुशबू है, घर में चाय बन रही है और रसोई से मूँग के पकौड़ों या उड़द के बड़े की खुशबू आ रही है। परिवार एक साथ बैठकर खाने वाला है। यह भारतीय जीवन की खूबसूरत तस्वीर है।लेकिन इसी तस्वीर में एक सवाल कहीं पीछे छूट जाता है।जिस मूँग और उड़द को हम अपने परिवार को खिला रहे हैं, क्या हम उस किसान को जानते हैं जिसने उसे पैदा किया है?हम सब अपने बच्चों के लिए दूध खरीदते समय उसकी गुणवत्ता को लेकर सजग रहते हैं। फल और सब्जियां खरीदते समय ताजगी देखते हैं। लेकिन दाल खरीदते समय अक्सर हमारी नजर केवल कीमत, रंग, चमक और पैकिंग पर रुक जाती है। शायद अब समय आ गया है कि हम एक कदम आगे बढ़ें।
दाल का ब्रांड जानने से पहले किसान को जानें-
मूँग और उड़द केवल फसल नहीं, हमारी थाली की रोज की कहानी हैं-
मूँग और उड़द हमारे भोजन में अनेक रूपों में शामिल हैं। साबुत दाल, धुली दाल, अंकुरित मूँग, मूँग का चीला, पकौड़े, उड़द के बड़े, पापड़, कचौरी और अनेक पारंपरिक व्यंजन इन्हीं फसलों से बनते हैं। अर्थात खेत में पैदा हुआ एक छोटा-सा दाना कई बार हमारे परिवार की थाली में पहुँचता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि दाना साफ है या नहीं। सवाल यह भी है कि उसे पैदा करते समय किसान ने क्या किया, क्यों किया और किस सलाह पर किया?
किसान के लिए मूँग और उड़द की कटाई आसान काम नहीं है। मौसम, बारिश, खेत की नमी, फसल की अवस्था और बाजार में जल्दी माल पहुँचाने का दबाव उसके निर्णयों को प्रभावित करते हैं। इसी दबाव में यदि कोई किसान फसल को जल्दी सुखाने या पौधों को तेजी से सुखाकर कटाई योग्य बनाने के लिए ऐसे रसायनों का प्रयोग करता है जो उस उपयोग के लिए अनुशंसित नहीं हैं, तो यह केवल किसान की गलती कहकर समाप्त कर देने वाला विषय नहीं है।
हमें यह समझना होगा कि बाजार की जल्दबाजी कभी-कभी खेत को गलत फैसले लेने के लिए मजबूर करती है।लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अनुशंसित मात्रा से अधिक रसायन, गलत रसायन, गलत समय पर छिड़काव या कटाई से पहले निर्धारित प्रतीक्षा अवधि का पालन न करना खाद्य पदार्थों में अवशेष की चिंता पैदा कर सकता है। भारत में दलहन सहित खाद्य पदार्थों में pesticide residues की नियमित निगरानी की व्यवस्था है।
हर रासायनिक छिड़काव को कैंसर का कारण बताना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन कुछ कीटनाशकों के लंबे समय तक संपर्क और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को लेकर वैज्ञानिक चिंताएं मौजूद हैं। इसलिए अनावश्यक और गैर-अनुशंसित रसायन प्रयोग को रोकना केवल कृषि का विषय नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी है।
सबसे खतरनाक भ्रम: ‘चमकदार मतलब अच्छा’-
बाजार ने हमें सुंदर दिखने वाली चीजों को बेहतर मानना सिखा दिया है। एक समान रंग, अधिक चमक, साफ-सुथरा दाना और आकर्षक पैकिंग देखकर हम संतुष्ट हो जाते हैं।
लेकिन दाने की चमक हमें यह नहीं बताती कि वह किस खेत से आया है। रंग उत्पादन की कहानी नहीं बताता। किसान बता सकता है।यही कारण है कि हमें केवल पैकेट पर भरोसा करने की आदत से आगे बढ़कर भोजन के स्रोत से जुड़ना होगा।
हमारे माता-पिता और दादा-दादी के समय में किसान और परिवार के बीच एक रिश्ता हुआ करता था। गांव में रहने वाला परिवार अपने अनाज, दाल, दूध, सब्जी या मसाले के स्रोत को जानता था। आज शहरों में रहने वाला परिवार अपने भोजन से बहुत दूर हो गया है। हम जानते हैं कि मोबाइल किस कंपनी का है, कार किस कंपनी की है और कपड़ा किस ब्रांड का है। लेकिन यह नहीं जानते कि हमारी दाल किस किसान ने उगाई है।यहीं से फैमिली किसान की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है।
फैमिली किसान का अर्थ केवल यह नहीं कि किसान से एक बार सामान खरीद लिया। इसका अर्थ है कि एक परिवार किसी किसान या किसान समूह के साथ लगातार जुड़ जाए।
- आप किसान को जानें।
- उसका खेत जानें।
- उसकी खेती की पद्धति जानें।
- उससे पूछें कि फसल कब बोई गई।
- किस प्रकार की खाद दी गई।
- कीट और रोग आने पर क्या किया गया।
- कटाई कब हुई।
- उत्पाद को कैसे सुखाया और सुरक्षित रखा गया।
- सबसे महत्वपूर्ण, किसान को केवल सस्ता उत्पाद देने वाला व्यक्ति न समझकर अपने भोजन का साझेदार समझें।
किसान से जुड़ने का मतलब किसान पर अविश्वास करना नहीं है यह भी समझना जरूरी है कि हर किसान रसायनों का गलत इस्तेमाल करना नहीं चाहता। किसान भी अपने परिवार के लिए भोजन पैदा करता है। वह भी स्वस्थ मिट्टी, अच्छी फसल और बेहतर भविष्य चाहता है। कई बार समस्या किसान की नीयत नहीं, बल्कि जानकारी, बाजार का दबाव, लागत, मौसम और जल्दी भुगतान की आवश्यकता होती है।
एक हालिया भारतीय अध्ययन में भी यह सामने आया है कि किसानों के जहरीले छिड़काव संबंधित निर्णयों पर व्यक्तिगत नेटवर्क सहित कई स्रोतों का प्रभाव रहता है।इसलिए केवल किसान को दोष देना समाधान नहीं है। उपभोक्ता और किसान के बीच सीधा संवाद बनाना समाधान का एक मजबूत रास्ता हो सकता है।
आप किसान के लिए क्या कर सकते हैं?
यदि आपके आसपास कोई ऐसा किसान है जो जिम्मेदार, जैविक, प्राकृतिक या कम-रसायन वाली खेती की दिशा में काम कर रहा है, तो उससे केवल बाजार भाव पर सौदेबाजी मत कीजिए। उससे एक रिश्ता बनाइए। कहिए कि आपकी जरूरत की मूँग, उड़द, गेहूं, चना या सब्जियां वह आपके लिए उगाए। आप उससे साल की जरूरत का कुछ हिस्सा पहले तय कर सकते हैं। किसान को बाजार की निश्चितता मिलेगी और आपको अपने भोजन के स्रोत की जानकारी। किसान की फसल खेत में तैयार होते समय उससे संपर्क रखिए। संभव हो तो खेत देखिए। उसकी कठिनाइयों को समझिए। अच्छी खेती के लिए उसे बेहतर कीमत देने में संकोच मत कीजिए।
क्योंकि किसान को केवल ग्राहक नहीं, स्थायी उपभोक्ता चाहिए और उपभोक्ता को केवल विक्रेता नहीं, भरोसेमंद किसान चाहिए। यही रिश्ता फैमिली किसान बना सकता है।
जैविक खेती का सबसे बड़ा अर्थ केवल ‘Organic’ शब्द नहीं है-
जैविक खेती को केवल किसी प्रमाणपत्र या लेबल तक सीमित कर देना भी उचित नहीं होगा। प्रमाणित जैविक उत्पादन निश्चित मानकों का पालन करता है और ऐसे उत्पादन की पहचान के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था है। भारत में NPOP जैविक उत्पादन के लिए निर्धारित मानकों का प्रमुख ढांचा है।
लेकिन एक जागरूक परिवार के लिए इससे आगे की बात भी है।
- किसान कौन है?
- उसका खेत कहाँ है?
- वह खेती कैसे करता है?
- वह मिट्टी को कैसे संभालता है?
- क्या वह अपनी फसल के बारे में उपभोक्ता से खुलकर बात करने को तैयार है?
यही प्रश्न भोजन और उपभोक्ता के बीच वास्तविक रिश्ता बनाते हैं।
किसान को उचित कीमत देना भी खाद्य सुरक्षा का हिस्सा है-
हम अक्सर सुरक्षित भोजन चाहते हैं, लेकिन सुरक्षित उत्पादन की लागत नहीं समझते। यदि हम किसान से कहते हैं कि वह बेहतर कृषि पद्धति अपनाए, अनावश्यक रसायनों से बचे, मिट्टी को स्वस्थ रखे और उत्पादन की प्रक्रिया में अधिक सावधानी बरते, तो हमें उसके उत्पाद के लिए उचित मूल्य देने की मानसिकता भी विकसित करनी होगी।सस्ता भोजन हमेशा सस्ता नहीं होता। कभी-कभी उसकी असली कीमत किसान की कम आय, मिट्टी की गिरती सेहत, उत्पादन में बढ़ती रासायनिक निर्भरता या भविष्य की खाद्य सुरक्षा के रूप में चुकानी पड़ती है।
इसके विपरीत, सीधे और भरोसेमंद किसान से खरीद का मॉडल किसान को बेहतर बाजार और उपभोक्ता को अधिक पारदर्शिता दे सकता है। भारत में किसान से सीधे खरीददारी और FPO आधारित बाजार जोड़ने के मॉडल को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
अगली बार जब आप मूँग या उड़द खरीदें तो केवल यह मत पूछिए
- कितने रुपये किलो है?
एक बार यह भी पूछिए—
- यह किस किसान की है?
और यदि जवाब मिल जाए, तो अगला सवाल हो—
- क्या मैं अगले मौसम में भी इसी किसान से खरीद सकता हूँ?
यहीं से बदलाव शुरू होगा। एक परिवार एक किसान से जुड़ेगा। दूसरा परिवार दूसरे किसान से।
कुछ परिवार मिलकर किसान समूह या FPO से जुड़ेंगे। धीरे-धीरे बाजार केवल उत्पाद खरीदने की जगह उत्पादन की पद्धति को समर्थन देने वाला माध्यम बन सकता है।बरसात में अगली बार मूँग का पकौड़ा या उड़द का बड़ा खाते समय इस छोटे से दाने को जरूर याद कीजिए। यह दाना खेत से आपकी थाली तक आया है। उसकी कहानी जानने की शुरुआत पैकेट खोलने से नहीं, किसान से जुड़ने से कीजिए।
इस बरसात एक नया संकल्प लें-
- ब्रांड कम जानिए, किसान ज्यादा जानिए।
- सिर्फ दाल मत खरीदिए, किसान से रिश्ता बनाइए।
- जहाँ संभव हो, अपने क्षेत्र के जिम्मेदार किसान को अपना “Family Farmer” बनाइए।
क्योंकि स्वस्थ भोजन की सबसे मजबूत कड़ी बाजार नहीं, किसान और परिवार के बीच का भरोसा है।
डॉ. शुभम कुमार कुलश्रेष्ठ, विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापक – उद्यान विभाग
(कृषि संकाय) रविन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, रायसेन, मध्य प्रदेश
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