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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 29 Aug 2026 6:48 PM |   14 views

अशांत समय में महर्षि महेश योगी की प्रासंगिकता

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब असहमति लोकतंत्र की स्वाभाविक शक्ति होने के बजाय अनेक बार संघर्ष का कारण बन जाती है। विचार अलग होना अब केवल वैचारिक मतभेद नहीं रह गया है; कई बार वह व्यक्ति-विरोध में बदल जाता है और व्यक्ति-विरोध देखते-देखते सामाजिक तनाव का रूप ले लेता है। सार्वजनिक जीवन में आरोप, प्रत्यारोप, उत्तेजना और आक्रोश का वातावरण बनता है तो सबसे पहले संवाद घायल होता है। ऐसे समय में पूज्य महर्षि महेश योगी जी की स्मृति केवल आध्यात्मिक संदर्भ में नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय संदर्भ में भी अत्यंत अर्थपूर्ण हो उठती है।
 
महर्षि महेश योगी जी का नाम आते ही भावातीत ध्यान, चेतना, आंतरिक शांति और मानव-मूल्यों की चर्चा सामने आती है। उन्होंने ध्यान को केवल किसी एक वर्ग, समुदाय अथवा साधना-परंपरा तक सीमित नहीं रखा। उनका प्रयास था कि मनुष्य अपने भीतर की उस चेतना को पहचाने, जहाँ तनाव और अशांति के पार एक गहरी शांति विद्यमान है। उनके विचारों का मूल आग्रह था कि मनुष्य के जीवन में परिवर्तन केवल बाहरी व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि उसकी चेतना के विकास से भी आता है।
 
यह विचार आज के सामाजिक वातावरण में विशेष रूप से महत्वपूर्ण दिखाई देता है। आज हम देखते हैं कि राजनीतिक और सामाजिक मतभेद कितनी तेजी से व्यक्तिगत संघर्ष में बदल जाते हैं। किसी व्यक्ति के विचार से असहमति हो तो उसके विचार का उत्तर देने के बजाय कई बार उसके चरित्र, संगठन, निष्ठा और राजनीतिक संबंधों पर प्रश्न उठने लगते हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र कर दिया है। कोई घटना घटती है और उसके तथ्य सामने आने से पहले ही उसके पक्ष और विपक्ष में निर्णय सुना दिया जाता है। मनुष्य ने न्यायालय बनने की अद्भुत जल्दी सीख ली है, जबकि जाँच अभी शुरू भी नहीं हुई होती।
 
आशुतोष रांका और CJP कार्यकर्ताओं से जुड़ी हाल की मारपीट की घटना तथा उसके बाद सामने आए राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप इसी व्यापक सामाजिक परिस्थिति को समझने का एक अवसर प्रदान करते हैं। यहाँ यह आवश्यक है कि किसी भी आरोप को तथ्य मान लेने से पहले उसकी स्वतंत्र पुष्टि की जाए। यदि किसी व्यक्ति या संगठन पर हमला हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। यदि किसी राजनीतिक दल पर आरोप लगाया गया है तो उसके समर्थन में प्रमाण सामने आने चाहिए। और यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें भी उसी स्पष्टता से खारिज किया जाना चाहिए। यही लोकतांत्रिक मर्यादा है।
 
महर्षि महेश योगी जी की दृष्टि से इस प्रसंग को देखें तो प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि किसने किसे पीटा, बल्कि यह भी बनता है कि हमारा सार्वजनिक जीवन उस बिंदु तक क्यों पहुँच रहा है जहाँ मतभेद हिंसक टकराव में बदलने लगते हैं।
 
लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है। असहमति समाप्त हो जाए तो लोकतंत्र जीवंत नहीं रह सकता। लेकिन असहमति के साथ संयम भी आवश्यक है। विरोध होना चाहिए, प्रश्न उठने चाहिए, आलोचना होनी चाहिए, आंदोलन होने चाहिए, लेकिन इन सबकी अंतिम भूमि संवाद ही होनी चाहिए।
 
महर्षि महेश योगी जी की शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि बाहरी परिवर्तन की स्थायी शुरुआत आंतरिक संतुलन से होती है। यदि व्यक्ति स्वयं भीतर से अशांत है तो उसका ज्ञान भी कभी-कभी आक्रोश का उपकरण बन सकता है। यदि मनुष्य भीतर से संतुलित है तो वह असहमति में भी दूसरे मनुष्य को शत्रु नहीं समझता। यह बात आज राजनीति के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी व्यक्तिगत जीवन के लिए।
 
राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक राजनीति का वास्तविक मूल्य इस बात में है कि वह विभिन्न विचारों, वर्गों और आकांक्षाओं को एक साझा सामाजिक धरातल प्रदान करे। इसलिए राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को समाप्त करना लोकतंत्र नहीं है; उसे पराजित करने के लिए बेहतर विचार प्रस्तुत करना लोकतंत्र है।
 
इसी प्रकार किसी संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ हिंसा को राजनीतिक असहमति का माध्यम बनाना भी लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए घातक है। यदि कोई व्यक्ति गलत है तो उसके विरुद्ध कानून है, सार्वजनिक बहस है, चुनाव है, न्यायिक व्यवस्था है और सामाजिक आलोचना है। हाथ उठाना तर्क की विजय नहीं, तर्क की असफलता का संकेत है।
 
महर्षि महेश योगी जी का महत्व इसीलिए केवल ध्यान-कक्ष तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनकी चेतना संबंधी अवधारणा को यदि व्यापक अर्थ में समझें तो वह हमें यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है कि क्या हमारी बाहरी सभ्यता के साथ हमारी आंतरिक सभ्यता भी विकसित हो रही है?
 
हमारे पास संचार के साधन पहले से अधिक हैं, लेकिन संवाद शायद पहले से कठिन हो गया है। हमारे पास सूचना पहले से अधिक है, लेकिन धैर्य कम दिखाई देता है। हम एक-दूसरे की बातें पहले से अधिक सुन सकते हैं, लेकिन दूसरे की बात समझने की इच्छा कई बार कम हो जाती है।
 
ऐसी स्थिति में ध्यान का अर्थ केवल आँखें बंद करना नहीं है। ध्यान का एक सामाजिक अर्थ भी है। वह है प्रतिक्रिया देने से पहले ठहरना, आरोप लगाने से पहले तथ्य देखना, विरोध करने से पहले दूसरे पक्ष को सुनना और क्रोध के क्षण में विवेक को जीवित रखना।आज की सबसे बड़ी आवश्यकता शायद यही है।
 
महर्षि महेश योगी जी ने भारत की आध्यात्मिक परंपरा को आधुनिक विश्व के सामने एक ऐसी भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जिसे आधुनिक मनुष्य समझ सके। उनका प्रभाव भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुँचा। उन्होंने चेतना और शांति के प्रश्न को वैश्विक मानव-समस्या के रूप में देखा। इसीलिए उनकी प्रासंगिकता किसी एक धर्म, राजनीति या भूगोल में सीमित नहीं है।
 
आज जब संसार अनेक प्रकार के तनावों से गुजर रहा है, तब उनकी मूल स्थापना हमें यह याद दिलाती है कि शांति केवल युद्ध न होने का नाम नहीं है; शांति मनुष्य के भीतर की ऐसी अवस्था भी है जहाँ हिंसा की आवश्यकता कम होने लगती है।
 
सार्वजनिक जीवन में भी यही सिद्धांत लागू हो सकता है। विरोधी को दुश्मन मानने के बजाय विरोधी विचार का प्रतिनिधि माना जाए। आरोप के स्थान पर प्रमाण को महत्व दिया जाए। उत्तेजना के स्थान पर संवाद को रखा जाए। हिंसा के स्थान पर कानून का सहारा लिया जाए।और राजनीतिक विजय के साथ मानवीय गरिमा को भी बचाए रखा जाए।यही किसी स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान होगी।
 
महर्षि महेश योगी जी को याद करने का आज इससे बेहतर अवसर शायद यही है कि हम उनकी शिक्षाओं को केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक शांति की चर्चा तक सीमित न रखें। उन्हें सामाजिक व्यवहार की कसौटी पर भी परखें। यदि ध्यान मनुष्य को भीतर से शांत करता है, तो उस शांति का परिणाम उसके व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। यदि चेतना विकसित होती है तो उसमें सहिष्णुता, विवेक और संवाद की क्षमता भी बढ़नी चाहिए।
 
आज की घटनाओं पर किसी एक राजनीतिक निष्कर्ष तक जल्दबाजी में पहुँचने के बजाय हमें एक व्यापक प्रश्न उठाना चाहिए|
 
क्या हम ऐसा सार्वजनिक जीवन बना सकते हैं जहाँ विचारों की लड़ाई विचारों से लड़ी जाए और मनुष्य को मनुष्य बने रहने दिया जाए? यदि इसका उत्तर हाँ है, तो महर्षि महेश योगी जी की प्रासंगिकता आज भी जीवित है। क्योंकि अंततः समाज बाहर से उतना ही शांत हो सकता है, जितना उसके भीतर रहने वाले मनुष्य शांत और संतुलित होंगे।
 
मन शांत होगा तो भाषा संयत होगी। भाषा संयत होगी तो संवाद बचेगा। संवाद बचेगा तो सहमति की संभावना बचेगी।और संवाद तथा सहमति की संभावना बचेगी तो लोकतंत्र भी अधिक मानवीय बनेगा। शायद यही आज महर्षि महेश योगी जी को स्मरण करने का सबसे सार्थक अर्थ है।
 
– प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” , डीन, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा
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