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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 20 Feb 2026 9:24 PM |   87 views

सामाजिक समरसता हमारी संस्कृति का हिस्सा -डॉ विश्वंभर

कुशीनगर-बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के राष्ट्रीय सेवा योजना के तीसरे दिन मुख्य अतिथि पूर्व विधायक पवन केडिया ने बौद्धिक सत्र में भारतीय संस्कृति और सामाजिक समरसता” विषय पर बोलते हुए कहा कि हमारी संस्कृति उदारता की संस्कृति है। हम सह अस्तित्व की भावना में विश्वास करते हैं। भारत की पहचान अनेकता में एकता की रही है।सामाजिक समरसता हमारे लिए लोकतांत्रिक विचार से ज्याद जीवन पद्धति है अतः समरसता चर्चा का नहीं अपितु जीवन में उतारने का विषय है। समरसता का भाव शिक्षा के माध्यम से ही समाज में फैलेगी

उन्होंने कहा कि जब तक देश के निवासी जाति, धर्म और भाषा से ऊपर उठकर समाज को एकजुट करते हुए समाज में समरसता कायम कर सकते हैं।

मुख्य वक्ता डॉ विश्वंभर नाथ प्रजापति ने बताया कि भारत प्राचीन काल से ही विविधता को पोषित और पल्लवित करने वाला देश है। हमारा देश सामाजिक समरसता के मूल मंत्र के साथ आगे बढ़ा है। सामाजिक समरसता हमारी संस्कृति का हिस्सा है। यहां शुरू से ही ज्ञान की समानांतर धाराएं एक साथ आगे बढ़ती रही है। यहां विभिन्न धर्म और दार्शनिक मत एक साथ आगे बढ़े हैं। यहां आस्तिक और नास्तिक दर्शन सहअस्तित्व के साथ साझा संस्कृति विकसित करते हैं।यही विचार हमारी विरासत है। हमारे एकता को विखंडित करने का कार्य पश्चिम ने किया।यह पश्चिम की विशेषता है जो अलग अलग दार्शनिक मत या मतांतर को भेदभाव के रूप में देखते हैं।जबकि भारतीय संस्कृति में समरसता उसका अंतर्निहित तत्व है।जिसे पश्चिम नहीं समझ पाया।

बौद्धिक सत्र की अध्यक्षता कर रहे डॉ सौरभ द्विवेदी ने बताया कि भारत की संस्कृति ही समरसता की संस्कृति है। अंग्रेज विश्वभर में जहां भी गए वहां वे मूलनिवासियों के असभ्य होने का टैग देते गए।

जबकि असभ्यता को खुद वे ढोते रहे।उनके यहां 500 वर्षों तक दास प्रथा प्रचलित रही।उन्होंने महिलाओं को मताधिकार का अधिकार बहुत बाद में दिया जबकि भारत ने राजनैतिक गुलामी के त्याग के साथ ही सभी तरह के। सामाजिक कुरीतियों को त्याग कर आगे बढ़ना सुनिश्चित किया।हमारे वेद, हमारे पुराण, हमारे उपनिषद किसी के प्रति भेदभाव, घृणा और अन्तर नहीं सीखते। हमारी महान परंपरा हमे सहअस्तित्व और अनुराग के साथ आगे बढ़ने की सीख देती है।

आभार ज्ञापन कार्यक्रम अधिकारी डॉ जितेंद्र मिश्र ने किया।बौद्धिक सत्र के विषय की स्थापना डॉ पारस नाथ ने किया।कार्यक्रम का संचालन स्वयंसेविका निवेदिता पाण्डेय ने किया | जबकि अतिथियों का परिचय एवं स्वागत कार्यक्रम अधिकारी डॉ निगम मौर्य ने किया।

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