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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 3 Feb 2026 7:15 PM |   212 views

प्राचीन भारतीय अभिलेख एवं मुद्राएं-अभिरूचि कार्यशाला ’’ राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला का आज शुभारम्भ

गोरखपुरः-राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर एवं प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग (दी0द0उ0गो0 वि0वि0,गोरखपुर) के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ’’प्राचीन भारतीय अभिलेख एवं मुद्राएं-अभिरूचि कार्यशाला ’’ राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला का आज शुभारम्भ विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग में हुआ। 
 
कार्यशाला का शुभारम्भ मुख्य अतिथि एवं विषय विशेषज्ञ प्रो0 विपुला दुबे पूर्व विभागाध्यक्ष, प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, दी0द0उ0गो0 वि0वि0, गोरखपुर एवं विशिष्टि अतिथि प्रो0 कीर्ति पाण्डेय, संकाय प्रमुख कला संकाय दी0द0उ0गो0 वि0वि0,गोरखपुर ने दीप प्रज्जवलित कर किया। विषय विशेषज्ञ ने शुभारम्भ सत्र में प्राचीन भारतीय अभिलेखों के महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला|
 
प्रो0 विपला दुबे ने द्वितीय सत्र में अपने व्याख्यान में इतिहास संरचना में अभिलेखों का महत्व विषयक अत्यन्त रोचक जानकारी प्रतिभागियों को प्रदान की। उन्होंने अशोक कालीन अभिलेखों से लेकर मध्यकाल तक के अभिलेखों के विकसित स्वरूप से सभी को परिचित कराया।
 
प्रो0 दुबे ने बताया की अभिलेख इतिहास परम्परा के संवाहक हैं। अभिलेखों से परिक्रिया एवं पुराकल्प इतिहास की जानकारी मिलती है। अभिलेखों के माध्यम से यह सिद्ध होता है कि भारत में इतिहास चेतना प्राचीनकाल से ही विद्मान थी। भारतीय संस्कृति को गहनता से समझने के लिए अभिलेखों का अध्ययन अनिवार्य एवं आवश्यक है। अभिलेखों में पदार्थ एवं शब्द समाहित हैं। जेम्स प्रिन्सेप द्वारा 1837-38 ई0 में ब्राम्ही लिपि के उद्वाचन से भारत में अभिलेखीय इतिहास लेखन में क्रांन्ति आई। अभिलेखों के बिना इतिहास संरचना बहुत तार्किक नहीं होती है। 
 
कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए प्रो0 राजवंत राव, प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, दी0द0उ0गो0 वि0वि0, गोरखपुर द्वारा अवगत कराया गया की लेखन कला का आरम्भ पूर्वांचल में हुआ। इसके साक्ष्य के रूप में कौड़ीराम-सहगौरा एवं कपिलवस्तु-पिपरहवा से प्राप्त अभिलेखों को स्वीकार किया जा सकता है। प्राचीन भारतीय मुद्राएं इतिहास लेखन में अत्यन्त प्रामणिक स्रोत स्वीकार की जाती हैं। मुद्राएं एवं अभिलेख इतिहास संरचना की रीढ़ रज्जू होते हैं। अभिलेख एवं मुद्राओं पर आधारित सात दिवसीय कार्यशाला में भारतीय अभिलेख एवं मुद्राओं के विस्तृत इतिहास से सभी प्रतिभागियों को परिचित कराने का प्रयास किया जायेगा।
 
प्रो0 प्रज्ञा चतुर्वेदी विभागाध्यक्ष, प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, दी0द0उ0गो0 वि0वि0, गोरखपुर द्वारा कार्यशाला के शुभारम्भ अवसर पर मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथि का स्वागत अभिवादन किया गया।
 
प्रो0 कीर्ति पाण्डेय द्वारा अपने उद्बोधन में कहा गया कि अभिलेख एवं मुद्राओं पर आधारित यह कार्यशाला प्रतिभागियों के लिए अत्यन्त उपयोगी एवं मार्गदर्शक सिद्ध होगी।
 
कार्यशाला संयोजक के रूप में डा0 यशवन्त सिंह राठौर, उप निदेशक, राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर द्वारा सप्त दिवसीय कार्यशाला की विस्तृत रूप-रेखा से प्रतिभागियों को अवगत कराया गया। अभिलेख एवं मुद्राओं के माध्यम से इतिहास लेखन अत्यन्त प्रमाणिक होता है। कार्यशाला में अभिलेखों के प्रकार, लिपियों के विकास, मुद्राओं का विकास आदि विभिन्न पहलुओं पर प्रतिभागियों को शिक्षित किया जायेगा।
 
उन्होंने अवगत कराया कि 04 फरवरी से 09 फरवरी, 2026 तक कार्यशाला का अवशेष आयोजन प्रतिदिन राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर के यशोधरा सभागार में पूर्वान्ह 11ः30 बजे से किया जायेगा।  
 
कार्यशाला के शुभारम्भ अवसर पर गोरखपुर परिक्षेत्र के लगभग 80 प्रतिभागियों सहित प्रो0 नन्दिता सिंह पूर्व छात्र अधिष्ठाता, दी0द0उ0गो0 वि0वि0, गोरखपुर, प्रो0 दिग्विजयनाथ मौर्य, प्रो0 प्यारे लाल मिश्र, डा0 विनोद कुमार, डा0 मणिन्द्र यादव आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।  
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