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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 3 Dec 2022 10:37 PM |   457 views

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की जयंती समारोह मनाया गया

नव नालन्दा महाविहार सम विश्वविद्यालय, नालन्दा में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की जयंती पर पाँचवाँ समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी  का विषय है – ‘ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद  का राजनीतिक दर्शन और भारतीय स्वाधीनता संग्राम ‘।
 
उद् घाटन सत्र में बीज वक्तव्य देते हुए प्रो. प्रकाश सिंह ने कहा कि राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि  विश्वविद्यालयों का ढाँचा बदलना चाहिए। तभी ज्ञान का असल स्वरूप सम्भव है। गाँधी जी ने अंग्रेज़ी सभ्यता पर गहरे सवाल उठाए थे। वंचितों के लिए वे उदारमना थे। उनके लिए कार्य भी किया था। वे भारतीय मूल्यों के वाहक थे। आज़ादी को प्राप्त करने में जिन नायकों का अवदान था किन्तु जो इतिहास की मुख्य धारा में नहीं रहे, इतिहास का पुनर्पाठ करते हुए उनको भी केन्द्रीय मान मिलना चाहिए । डॉ. प्रसाद का दूसरा  कार्यकाल समाप्त होने के अवसर पर रामलीला मैदान  में उनके सम्मान में आयोजित सभा में लाखों लोग आए। यह उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।
 
मुख्य अतिथि प्रो. रमेशचंद्र सिन्हा ने कहा कि राजेन्द्र प्रसाद गाँधी जी से पहली बार चंपारण में मिले थे। राजेन्द्र प्रसाद को जो प्रसिद्धि मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली। वे केवल राष्ट्रपति के कारण महत्त्वपूर्ण नहीं थे। वे एक श्रेष्ठ लेखक , विचारक व  संस्कृति-मर्मज्ञ थे। उनकी पुस्तक ‘खंडित भारत’ अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह पुस्तक उन्हें दार्शनिक के रूप में निरूपित करती है। उपनिवेशवाद को तोड़ने से साम्प्रदायिकता समाप्त होगी। सांस्कृतिक दासता आज भी विद्यमान है। उपनिवेश के भाव से उबरने में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के विचार महत्त्वपूर्ण हैं। 
 
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए नव नालन्दा महाविहार के कुलपति प्रो. वैद्यनाथ लाभ ने कहा कि डॉ. राजेन्द्र प्रसाद  नि:स्वार्थ, निष्कपट व राजर्षि थे। भारत का इतिहास प्रतिरोध का इतिहास रहा है। राजेन्द्र बाबू आचरण की सभ्यता में विश्वास करते थे। भारतीय समाज यदि धर्म, क्षेत्र, जाति आदि में बँटा रहा है तो उस स्थिति में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के विचार हमारे काम आ सकते हैं। वहाँ वास्तविक ‘भारत’ दिखाई देता है। उनके विचार केवल अकादमिक नहीं थे अपितु वे ‘जीवन की व्यावहारिकता’ को अभिव्यक्त करते हैं। ‘अंतिम व्यक्ति के लिए  न्याय’ ही राजेन्द्र बाबू का ध्येय था। उनकी विशिष्टता यह थी कि  वे ‘साधारण समाज’ के साथ एकाकार थे।
 
इस अवसर पर डॉ.  कामेश्वर प्रसाद पासवान की पुस्तक –  ‘ बौद्ध तीर्थ स्थलों का प्रामाणिक इतिहास ‘ का लोकार्पण किया गया। उन्होंने बौद्ध तीर्थों के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला।
 
संचालन व संयोजन करते हुए बौद्ध अध्ययन विभाग के सहायक आचार्य डॉ. सुरेश कुमार ने कहा कि यह आयोजन डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की दृष्टि को समझने में सहायक होगा। वे आधुनिक भारत के सांस्कृतिक – राजनीतिक महानायक थे। उन्होंने भारत को एक नई दिशा दी।
 
इस कार्यक्रम में डॉ. नीहारिका लाभ के आलावा, प्रो. घनश्याम लाल दास, डॉ. अनिल मिश्र, प्रो. मनीष सिन्हा, प्रो. मिथिलेश , डॉ. भैरव लाल दास , डॉ. शिवकुमार मिश्र, श्री ललित आदि के साथ अन्य विचारक, नव नालन्दा महाविहार के आचार्य, शोध छात्र, छात्र, गैर शैक्षणिक समुदाय के लोग उपस्थित थे। 
 
अकादमिक सत्र की अध्यक्षता डॉ. अनिल मिश्र ने की। प्रो. मनीष सिन्हा, प्रो. संजय श्रीवास्तव, डॉ. अजय कुमार, डॉ. विकास सिंह, डॉ. अजय कुमार बर्नवाल, डॉ. रवि  रंजन , विवेक कुमार ने अपनी वैचारिक भागीदारी की।
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