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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 29 Jan 7:32 PM

बसंत पंचमी

भारत पर्वो का देश है और यहाँ  का प्रत्येक पर्व एक नया सन्देश देता  है | जैसे जीवन जीने की कला का इजहार , समाज में मानवीय मूल्यों एवं आदर्शों की स्थापना तथा नई सोच के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा |

माघ महीना के शुक्ल पक्ष की  पंचमी को बसंत पंचमी कहा जाता है |इस दिन को लोग कई नामो से जानते हैं – बसंत पंचमी , श्री पंचमी ,सरस्वती पूजा आदि |बसंत पंचमी को मदनोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है | जिसके देवता कृष्ण और कामदेव है | बसंत पंचमी से नये   ऋतु  का प्रारंभ हो जाता है , लोग  गुलाल उड़ाकर होली और घमार गाकर इस उत्सव का स्वागत करतें हैं |बसंतोत्सव का अंतिम दिन रंगोत्सव के रूप में मनाया जाता है | 

बसंत पंचमी की पृष्ठभूमि में अनेको कहानिया प्रचलित है |सरस्वती कंठामरण में लिखा गया है कि बसंत पंचमी के दिन बसंत का अवतरण होता है |मत्स्य सूक्त और हरिभक्ति विलास  में भी इसी दिन से बसंत का प्रादुर्भाव मन जाता है |माना जाता है कि बसंत पंचमी के दिन कामदेव के पंचस्वर – रूप , रस , गंध ,स्पर्श , और शब्द को पृथ्वी पर प्रकृति अभिसिंचित करती है |

यह पर्व नए वर्ष के आगमन की सूचना देता है | प्रकृति अपनी खूबसूरती को इसके स्वागत में धरा पर बिखेर देती है |चारो ओर मस्ती ही मस्ती दिखाई देने लगती है |आमों में मौर और सरसों के फुल तो समा बांध देते है |इसलिए तो बसंत को ऋतुराज कहा जाता है | गाँवों में तो बसंत पंचमी से ही नए वर्ष का प्रारंभ माना जाता है |

बसंत पंचमी के साथ सरस्वती पूजन का भी प्रचलन है |कहा जाता है कि जब ब्रह्मा जी सम्पूर्ण श्रृष्टि रचने के बाद देखते हैं तो चारों और सन्नाटा छाया हुआ है |तभी अपने कमण्डल से पौधों पर जल छिडकते हैं उसके बाद एक सुन्दर कन्या चार भुजाओं वाली प्रकट होती है , जिसके एक हाथ में वीणा है |ब्रह्मा जी वीणा बजाने के लिए कहते है |वीणा बजते ही सम्पूर्ण श्रृष्टि में वाणी का  संचार हो जाता है |इसलिए सरस्वती को वाणी की देवी भी कहा जाता है |   

           ( नरसिंह ) 

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