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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 19 Oct 2:14 PM

हिंदी के लिए खतरा

एक बेर एगो बइठकी भोजपुरी परिषद, बलिया के तत्वावधान में चलत रहे| भोजपुरी परिषद के सचिव भइला के नाते हमीं संचालन करत रहलीं| ओ बइठकी में भोजपुरी, हिंदी आ अंग्रेजी तीनों भाषा के विद्वान जुटल रहे लोग |
 
बइठकी के विषय रहे — भोजपुरी के दशा आ दिशा| एगो के बाद एगो विद्वान लोग आपन आपन विचार रखत रहे लोग, ओही क्रम में हम एगो हिंदी के प्रोफेसर से आपन विचार राखे के निहोरा कइलीं| उहां के आपन शुरू करत कहलीं कि ” सब केहू हिंदी के मान्यता आ आठवीं सूची में शामिल करे के बात कहि रहल बा बाकिर ई केहू नइखे सोचत कि जहिया भोजपुरी के देखा देखी कुल्ही क्षेत्रीय भाषन के मान्यता मिल त हिंदी के का होई| एसे हम भोजपुरी के मान्यता के पक्ष में नइखीं काहें कि ओसे हिंदी के बहुते नुकसान हो जाई| हिंदी बिला जाई, भोजपुरी के पाले ना त शब्द सम्पदा बा आ ना सामर्थ्य बा” |
 
प्रोफेसर साहब के बात सुन के सभे तिलमिला गइल| उनके बाद संचालक के नाते बोले शुरू कइलीं ” भोजपुरी आ कुल क्षेत्रीय भाषन से रउआं एतना नफरत बा भा इन्हनी से हिंदी के नुकसान लउकत बा त अगर क्षेत्रीय भाषा के कवियन के हिंदी से निकाल दिहल चाहता|
 
हमरा समझ से विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी, नरोत्तमदास, रसखान, मीराबाई, जायसी वगैरह ना रहिहें त हिंदी कहाँ रही| हिंदी का बांची  आ रउआं का पढ़ब आ का पढ़ाइब, भोजपुरी भाषा से हिंदी के खतरा नइखे बल्कि भोजपुरी हिंदी खातिर सम्बल बा| जहाँ तक शब्द सम्पदा के सवाल बा, भोजपुरी जस समृद्ध कवनो भाषा नइखे| जइसे छरछराता, परपराता, बथता, बेधता, अगियाता, भभाता, टभकता ,कोंचता, छेदता, कनकनाता वगैरह शब्द शारीरिक पीड़ा खातिर बाड़न स बाकिर हिंदी में एकरा खातिर कवनो पर्यायवाची नइखे| वइसहीं माटी के बर्तन खातिर दियरी दीया ढकनी परई कसोरा कराह घूंचा पतुकी कहतरी मेटा हाड़ी घइली गगरी कूणा छोंड़ वगैरह खातिर हिंदी में कवनो पर्यायवाची नइखे|
 
ए तरे हिंदी के अपेक्षा भोजपुरी ज्यादा सामर्थ्यवान बा| भोजपुरी क्षेत्र के रहे वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आ विद्या निवास मिश्र के जगह पर केहू दोसर विद्वान रहल रहित त उन्नीस सौ उन्चासे में भोजपुरी संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल हो गइल रहित| उन्हन लोग के एही तरह के संकुचित मानसिकता के कारण भोजपुरी के मान्यता ना मिल पावल|
 
हिंदी के खतरा भोजपुरी से ना बल्कि अंग्रेजी से बा| हिंदी माध्यम के स्कूल टूट रहल बा आ अंग्रेजी फरत फूलात आगे बढ़ रहल बा| एपर विचार आ चिंतन के जरूरत बा, भोजपुरी के विरोध से खाली संकुचित मानसिकता लउकी.” एकरे बाद त ऊ प्रोफेसर साहब हमसे बहुत नाराज हो गइलीं आ जहाँ तहाँ कहे लगलीं कि आग्नेय हमके बहुते अपमानित कइले बाड़न|
 
बाकिर हम केहू कवनो जवाब ना देत रहनीं बाकिर जे सुने ऊ उनहीं के दोषिया ठहरावे, धीरे धीरे ऊहां के नार्मल हो गइली| सही बात के एहसास उनके हो गइल अब आज प्रेम से मिलेलन, अब कवनो बात नइखे|
 
डॉ भोला प्रसाद ” आग्नेय 
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