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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 15 Aug 10:17 AM |   12 views

स्वतंत्रता दिवस

मानव स्वभाव है सुख की आकांक्षा | सुख सब लोग चाहतें हैं किन्तु सुख की खोज ही तो दुःख का कारण है |स्वतंत्रता प्राप्ति का इतिहास भी ऐसा ही है |अंग्रेजो के कूर शासन एवं विदेशी आक्रान्ताओं के कारण सुख भोग रहे भारतीय दुःख भीगने के लिए विवश हो गये |हमारी स्वतंत्रता समाप्त हो गयी और हम परतंत्रता की बेडी में जकड दिए गये |जो इसके विरुद्ध आवाज उठाने की हिम्मत की ,वह या तो जेल गया या सीधे फांसी के फंदे पर लटका दिया गया |  

15 अगस्त 1947 के पूर्व का इतिहास यदि सबकी जेहन में हो तो कोई भारत माँ की स्वतंत्रता पर आंच आने देने की बात भी नही सोच सकता | क्योंकि सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत स्वतंत्रता दिवस के पूर्व गुलामी की जंजीरों से बंधा था |आप एक चिड़िया को देखिये क्या वह सोने के पिजरें में सुखी रहती है या पेड़ की डाली पर ? उसका भी जबाब होगा , वह उस पंक्षीसे सुनिए जो कहता है —–

” आता है याद मुझको गुजरा हुआ जमाना 

वो झाड़िया चमन थीं जो मेरा आशियाना |

अर्थात सोने की पिजड़े की बजाय वह झाड़ियो में ही सुखी था , और रहे भी क्यों न –

सर्वम परवशम दुःख सर्वमामवशं सुखम 

एत द्विघात समासेन लक्षणम सुख दुःखयो 😐

स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हमे वीर सपूतों के बलिदान को नही भूलना चाहिए |भारत माँ को स्वतंत्र करने के लिए उन शहीदों की मा से पूछिए ,जिनकी गोद सुनी हो गयी | उन पत्नियों से पूछिये ,जिनके सिंदूर उजड़ गये , उन बहनों से पूछिए जिनके भाईयो के कलाईयों पर राखी बाधने का अवसर छीन गया | मैं गत वर्ष पंजाब गया था , जलीयाँवाला बाग़देखने |वह कुआं देखा जो वीर सपूतों की शवों से कभी पट गया था | वह घर देखा जो निहत्थे वीर सपूतों के बलिदान की गाथा गा रहा हैं |उस स्थान के इतिहास और चिन्ह स्वरुप खड़े प्रतीकों की याद आने पर कलम रुक जा रही हैऔर आँखों में आंसू आ जा रहें हैं  | जब हम सोच – सोच के इस स्थिति में हो जा रहें है ,तो ज़रा उनकी सोचिए ,जिनके सीने गोलियों से छलनी कर दिए गये |

चंद्रशेखर आज़ाद , भगत सिंह , पंडित राम प्रसाद , दादा भाई नौरोजी , नेता जी सुभाषचंद्र , महारानी लक्ष्मीबाई उधमसिंह सरीखे शहीदों को याद करें , जो भारत माँ की बलिवेदी पर आत्मोत्सर्ग कर दिए |

यातनाओं के समुद्र में गोता लगाते हुए हमारे अमर शहीदों का बलिदान आखिर 15 अगस्त 1947 को रंग लाया |  राष्ट्रपिता गांधीजी का  नेतृत्व  फलीभूत हुआ और 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता के नौज्ज्वलप्रभात का दर्शन हुआ |भारत माँ की कलु ष कालिमामयी दासता की लौह श्रृंखलायें टूटी और देश आज़ाद हुआ | दिल्ली के लाल किले पर यूनियन जैक के स्थान पर हमारा तिरंगा लहराया , और भारत माँ का जयघोष हुआ |    

पीछे मुड़कर जब भी आप देखेंगे हमारी स्वतंत्रता का इतिहास त्याग , बलिदान और यातनाओं का रहा है | हम आज आज़ाद है किन्तु यह आज़ादी अक्षुण्य बनी रहे इसका प्रयास होना चाहिए |हमारे लिए राष्ट्र धर्म सर्वोपरि हो |हमारे मनीषी कहतें हैं कि  “राष्ट्र अर्थे तन व्य्जते” अर्थात शरीर का त्याग हो तो राष्ट्र के लिए |

( कैप्टन विरेन्द्र सिंह , वरिष्ठ पत्रकार ) 

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